क्या ईरान के साथ युद्ध में मिली हार को पचा नहीं पा रहा है ट्रंप प्रशासन ??
28 फ़रवरी को अमेरिका और इस्राईल ने ईरान में जो युद्ध अपराध किया है वह किसी से ढका छुपा नहीं है। ईरान को वार्ता की मेज़ पर बुलाकर पर धोखे से उस पर हमला कर दिया। अमेरिका ने इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई को उनकी बेटी, दामाद, उनकी बहू और उनकी मासूम पोती के साथ शहीद कर दिया। इतना ही नहीं उसने धोखे से किए गए इस वहशियाना हमले में, मीनाब स्कूल की 168 मासूम छात्राओं को भी शहीद कर दिया। अमेरिका के इस वहशियाना हमले की पूरी दुनिया में निंदा की गई। पूरी दुनिया में नेतन्याहू और ट्रंप के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए।
इस प्रदर्शन में पूरी दुनिया के इंसाफ़ पसंद लोगों का ट्रंप और नेतन्याहू से बस एक ही सवाल था:
ऐ इंसानियत के ख़ूंख़्वार दरिंदों, बताओ उन मासूम बच्चियों का क्या क़सूर था जिन्हें तूने उस वक़्त शहीद कर दिया जब वह अपने नन्हे नन्हे हाथों में किताबों का बस्ता लिए स्कूल में पढ़ने बैठी हुई थीं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को वेनेजुएला समझ लेने की रणनीतिक भूल कर दी थी। उन्हें लगा था कि, सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई की शहादत के बाद ईरान पर उनका क़ब्ज़ा हो जाएगा। ईरानी सुप्रीम लीडर की शहादत के बाद उन्होंने अहंकार में डूबकर कहा था कि, अब तेहरान की सत्ता, न्यूयार्क से चलेगी। अब भला उन्हें कौन समझाता कि, न तो ईरान वेनज़ुएला है और न ही ईरान के सुप्रीम लीडर, निकोलस मादुरो। सुप्रीम लीडर की शहादत के बाद, ईरान में ऐसा लगा मानो किसी ने सोए हुए शेर को जगा दिया हो। इन्तेक़ाम की आग में जल रही ईरानी सेना ने ऐसा पलटवार किया जिसकी उम्मीद ट्रंप को क्या पूरी दुनिया को नहीं थी।
मिडिल ईस्ट में सभी अमेरिकी अड्डे तबाह हो गए। ईरान पर हमले के लिए अमेरिका और इस्राईल को अपनी ज़मीन देने वाले अरब शासकों को ऐसे हमले की उम्मीद नहीं थी। वह मूक दर्शक बने अपने देश में अमेरिकी एयरबेस की तबाही देखते रहे। दुबई, बहरीन, क़तर, कुवैत, सऊदी और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी एयरबेस आईआरजीसी के इंतेक़ाम से कांपने लगे। आईआरजीसी ने अगर सबसे ज़्यादा तबाही कहीं मचाई तो वह है, बहरीन, कुवैत और जॉर्डन। अमेरिका को ईरान द्वारा इतने भयानक पलटवार की उम्मीद नहीं थी। 39 दिन में अमेरिकी राष्ट्रपति को अपनी हार साफ़ नज़र आने लगी। उन्होंने आनन फ़ानन में एकतरफ़ा सीज़फ़ायर का एलान कर दिया। ईरान ने पूरी दुनिया को यह संदेश देने के लिए कि, हम शांतिप्रिय देश हैं, फ़ौरन हमले को रोक दिया।
ट्रंप ने जब सीज़फ़ायर का एलान किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और ईरान इस युद्ध में अपनी जीत की पटकथा लिख चुका था। पूरी दुनिया ने इस युद्ध में ईरान को विजेता मान लिया। अमेरिका ने पूरी दुनिया में सुपर पावर होने का जो भौकाल बनाया था, वह ईरान के जियालों ने 39 दिन में ही धराशायी कर दिया। अमेरिका इस युद्ध से बाहर निकलने के बहाने तलाश करने लगा। ट्रंप प्रशासन की समझ में नहीं आ रहा था कि, वह इस युद्ध से कैसे बाहर निकले?? डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध से विजेता बनकर बाहर निकलना चाहते है, उनके सामने मुश्किल वह यह कि, वह अपने आपको विजेता कैसे घोषित करे?? उनके सहयोगी देश भी यह मान चुके हैं कि, ईरान को युद्ध के मैदान में नहीं हराया जा सकता। यही कारण था कि, नाटो समेत यूरोपीय देशों में से कोई भी देश खुलकर मैदान में सामने नहीं आया।
ट्रंप इस युद्ध में जीत के लिए रोज़ एक नया खोखला दावा करते हैं, और ईरानी सेना उन दावों की धज्जियां उड़ा देती है। कभी वह यह दावा करते हैं कि, ईरान की सेना ख़त्म हो चुकी है, और कभी वह यह कहते हैं की होर्मुज़ पर हमारा पूरा कंट्रोल है। ईरानी सेना फ़ौरन ही उनके इस झूठे दावों की पोल खोल देती है। कभी होर्मुज़ में उनकी पनडुब्बी (सबमरीन) को अपने क़ब्ज़े में लेकर तो कभी जार्डन में उनके जेट्स और उनके सैनिकों को ख़त्म करके। आजकल अमेरिका ने एक बार फिर, एक फेक वीडियो द्वारा अपनी ताक़त दिखाने का प्रयास किया है।
इस वायरल वीडियो में यह दिखाया गया है कि, अमेरिका ने ईरान की सरज़मीन पर फंसे एक अमेरिकी पॉयलट को सुरक्षित निकाला था। इस फेक वीडियो पर डोनाल्ड ट्रंप तो भरोसा कर सकते हैं लेकिंन कोई दूसरा भरोसा नहीं कर सकता। खुद अमेरिकी जनता भी इस पर भरोसा नहीं कर सकती, क्योंकि सैटेलाइट तस्वीरों ने अमेरिकी दावों की बक्खियाँ उधेड़ कर रख दी हैं। क़तर, बहरीन, जार्डन और दुबई में अमेरिकी अड्डे पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। ख़ुद अमेरिकी फ़ौज के जनरल ने यह बात स्वीकार की है कि, बहरीन में अमेरिकी एयरबस ईरानी मिसाइलों से पूरी तरह तबाह हो चुका है, और अब उसे सही होने में काफी समय लगेगा।


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