सीरिया में बढ़ता जा रहा है उज़्बेक लड़ाकों और अल-जूलानी सरकार के बीच टकराव

सीरिया में बढ़ता जा रहा है उज़्बेक लड़ाकों और अल-जूलानी सरकार के बीच टकराव

सीरिया में सत्ता परिवर्तन के बाद अब नई सरकार के सामने एक नई चुनौती उभर रही है। उज़्बेक मूल के विदेशी लड़ाकों के एक समूह ने आरोप लगाया है कि अबू मोहम्मद अल-जौलानी के नेतृत्व वाली सरकार उन पर दबाव बना रही है, उन्हें गिरफ्तार करने की धमकियां दे रही है और कुछ मामलों में देश से निष्कासन की चेतावनी भी दी जा रही है।

विदेशी लड़ाकों द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि वे नई सीरियाई सेना में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि उन्होंने वर्षों तक संघर्ष एक स्वतंत्र इस्लामी उद्देश्य के लिए किया था, इसलिए वे अपनी अलग पहचान और संगठनात्मक ढांचे को समाप्त नहीं करना चाहते। बयान में यह भी कहा गया है कि जो लड़ाके पहले ही सरकारी सेना में शामिल हो चुके हैं, उन पर भी सेना छोड़ने का दबाव डाला जा रहा है।

यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही विदेशी लड़ाके, जिनमें उज़्बेक, चेचन, ताजिक और अन्य देशों के लड़ाके शामिल हैं, वर्षों तक बशर अल-असद सरकार के खिलाफ विद्रोह में अल-जूलानी और उसके सहयोगियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते रहे थे। अब सत्ता हासिल होने के बाद नई सरकार सभी सशस्त्र गुटों को एक केंद्रीकृत सैन्य ढांचे के अधीन लाना चाहती है, जबकि कई विदेशी लड़ाके अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते हैं।

दूसरी ओर, अल-जूलानी सरकार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दबाव है कि वह विदेशी लड़ाकों और स्वतंत्र सशस्त्र गुटों को नियंत्रित करे। इसी कारण इदलिब और आसपास के क्षेत्रों में हाल के महीनों में कई विदेशी लड़ाकों की गिरफ्तारियां हुई हैं तथा सुरक्षा बलों की गतिविधियां बढ़ी हैं।

इदलिब प्रांत में जारी यह खींचतान केवल प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि यह नई सरकार और उसके पूर्व सहयोगियों के बीच भरोसे के संकट को भी दर्शाती है। यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो सीरिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में आंतरिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे नई सरकार की स्थिरता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी लड़ाकों का मुद्दा आने वाले समय में अल-जूलानी सरकार के लिए सबसे कठिन चुनौतियों में से एक बन सकता है, क्योंकि इन्हीं लड़ाकों ने विद्रोह के वर्षों में उसकी सैन्य शक्ति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन अब वे सरकार के अधिकार और नीतियों को चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं।

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