अमेरिका ने ईरान के साथ वार्ता में तीन शर्तें रखकर फिर दिखाई दबाव की नीति

अमेरिका ने ईरान के साथ वार्ता में तीन शर्तें रखकर फिर दिखाई दबाव की नीति

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने फॉक्स न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में ईरान के संबंध में वॉशिंगटन के दावों को दोहराते हुए कहा कि वार्ता को समाप्त करने के लिए तीन प्रमुख मुद्दों का समाधान आवश्यक है। उन्होंने दावा किया, “अंतिम परिणाम का क्या अर्थ है? यदि इसका मतलब यह सुनिश्चित करना है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुला रहे, उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम हमारे नियंत्रण में आ जाए और ईरान के पास परमाणु हथियार न हों, तो यही वार्ता का अंतिम निष्कर्ष होगा।”

ईरान का कहना है कि अमेरिका की ये मांगें किसी समान और सम्मानजनक वार्ता की बजाय दबाव और एकतरफा शर्तें थोपने की कोशिश हैं। तेहरान लंबे समय से यह स्पष्ट करता आया है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्षेत्रीय जलमार्ग होने के साथ-साथ उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा विषय है, इसलिए किसी बाहरी शक्ति को इस संबंध में शर्तें तय करने का अधिकार नहीं है।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का यह रुख उस नीति की याद दिलाता है जिसके तहत वॉशिंगटन वर्षों से प्रतिबंधों, राजनीतिक दबाव और कूटनीतिक शर्तों के माध्यम से ईरान पर अपनी इच्छाएं थोपने का प्रयास करता रहा है। ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि यदि वार्ता का उद्देश्य वास्तव में समाधान खोजना है, तो दोनों पक्षों के अधिकारों और चिंताओं का सम्मान किया जाना चाहिए, न कि केवल एक पक्ष की मांगों को स्वीकार करने की अपेक्षा की जानी चाहिए।

स्कॉट बेसेंट का यह दावा भी विवाद का विषय बन गया कि ईरान पहली बार परमाणु हथियार न रखने के मुद्दे पर बातचीत कर रहा है। ईरान कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुका है कि उसका परमाणु हथियार बनाने का कोई इरादा नहीं है। इसके अलावा, ईरान परमाणु समझौता (JCPOA) के दौरान भी यह विषय विस्तृत वार्ताओं का हिस्सा रहा था। इसलिए ईरानी पक्ष और कई पर्यवेक्षक बेसेंट के इस बयान को तथ्यों से मेल न खाने वाला मानते हैं।

तेहरान का कहना है कि वह किसी भी वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन ऐसी बातचीत तभी सफल हो सकती है जब उसमें पारस्परिक सम्मान, बराबरी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन हो। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका की ओर से बार-बार नई शर्तें और अतिरिक्त मांगें पेश करना वार्ता प्रक्रिया को जटिल बनाता है तथा विश्वास बहाली के प्रयासों को कमजोर करता है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अमेरिका की हालिया टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि वॉशिंगटन अभी भी दबाव की रणनीति को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जबकि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभु अधिकारों पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के पक्ष में दिखाई नहीं देता।

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