वार्ता के पहले दौर में ईरान विजयी रहा: टाइम्स ऑफ़ इज़रायल

वार्ता के पहले दौर में ईरान विजयी रहा: टाइम्स ऑफ़ इज़रायल

अख़बार टाइम्स ऑफ़ इज़रायलने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि अमेरिका और इस्लामी गणराज्य ईरान के बीच हाल में हुई कूटनीतिक वार्ता का दौर तेहरान के लिए उपलब्धियों के साथ समाप्त हुआ।

इज़रायली संसद (कनेसेट) की पूर्व सदस्य और टाइम्स ऑफ़ इज़रायल की विश्लेषक केसेनिया सुतलोवा ने ईरान और अमेरिका के बीच हुई कल की वार्ता पर लिखा:

“अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक द्वंद्व का पहला राउंड ईरान की जीत के साथ समाप्त हुआ। तेहरान ने ओमान की मध्यस्थता से होने वाली अप्रत्यक्ष वार्ता को केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित रखने में सफलता पाई और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों की गतिविधियों तथा बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम जैसे अन्य संवेदनशील विषयों को बातचीत के दायरे में आने से रोक दिया। वार्ता का स्थान भी ईरान की इच्छा के अनुसार ओमान में और उसी प्रारूप में आयोजित हुआ जैसा तेहरान चाहता था।”

सुतलोवा आगे लिखती हैं:
“वार्ता शुरू होने से पहले इज़रायल में कुछ टिप्पणीकारों और सुरक्षा विश्लेषकों ने सैन्य हमले की चेतावनी दी थी। इस माहौल ने यहूदी बस्तियों में व्यापक चिंता पैदा कर दी, कई लोग रातें बंकरों में बिताने लगे और कुछ इज़रायलियों के घबराहट के दौरे के कारण अस्पताल पहुँचने की खबरें भी सामने आईं। हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने फिलहाल इंतज़ार करने और कूटनीतिक रास्ते को एक और अवसर देने का फैसला किया है।”

यह पूर्व कनेसेट सदस्य याद दिलाती हैं कि जब से ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दंगाइयों से कहा था कि “मदद रास्ते में है”, तब से फ़ार्स की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन अमेरिकी बल व्यापक सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार नहीं हैं।

वह आगे लिखती हैं:
“क्या दुनिया का सबसे सुंदर बेड़ा—जिस शब्द का प्रयोग ट्रंप अक्सर अमेरिकी नौसेना के लिए करते हैं—वास्तव में ईरान को गिराने के लिए एक व्यापक और पूर्ण हमले के लिए पर्याप्त है?”

सुतलोवा 1991 के खाड़ी युद्ध में हुए “डेज़र्ट स्टॉर्म” अभियान का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि कुवैत को मुक्त कराने के लिए 35 देशों के लगभग दस लाख सैनिकों वाला अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाया गया था, जबकि आज ईरान के खिलाफ ऐसा कोई व्यापक गठबंधन मौजूद नहीं है और उसके बनने की संभावना भी बहुत कम है।

वह व्यंग्यात्मक लहजे में ट्रंप पर टिप्पणी करती हैं कि ऐसे लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल एक नौसैनिक बेड़े से कहीं अधिक बड़े स्तर पर सैन्य जुटान की आवश्यकता होगी, भले ही वह बेड़ा कितना ही “सुंदर” क्यों न हो।

अंत में सुतलोवा दो संभावित परिदृश्यों की चर्चा करती हैं:
“ट्रंप शायद सत्ता के प्रतीकों, कुछ सैन्य ठिकानों या कुछ परमाणु प्रतिष्ठानों पर सीमित हमलों तक ही खुद को सीमित रखें, लेकिन ऐसा कदम न तो तेहरान को अंतिम लक्ष्य यानी ‘शासन परिवर्तन’ के करीब ले जाएगा और न ही इससे फायदा होगा। उल्टा, यह ईरान और क्षेत्र के अन्य खिलाड़ियों के मुकाबले अमेरिका की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकता है।”

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