लेबनान युद्ध-विराम के बाद नेतन्याहू पर आंतरिक दबाव बढ़ा

लेबनान युद्ध-विराम के बाद नेतन्याहू पर आंतरिक दबाव बढ़ा

दक्षिण लेबनान में घोषित युद्ध -विराम ने केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में अस्थायी शांति ही नहीं लाई, बल्कि इज़रायली राजनीति के भीतर भी एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। यह युद्ध-विराम ऐसे समय में हुआ जब हिज़्बुल्लाह लगातार सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय था और कथित तौर पर कधब्ज़े वाले क्षेत्रों की गहराई तक हमले जारी थे। साथ ही, क्षेत्रीय स्तर पर ईरान की कूटनीतिक सक्रियता और अमेरिका पर बढ़ते दबाव को भी इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल खड़े होने लगे हैं। इज़रायल के पूर्व सेना प्रमुख गादी आइज़नकोट ने खुलकर कहा कि यह युद्ध-विराम दरअसल नेतन्याहू की राजनीतिक विफलता को दर्शाता है। उनके अनुसार, सैन्य स्तर पर जो भी उपलब्धियाँ हासिल की गईं, उन्हें किसी ठोस राजनीतिक परिणाम में बदलने में सरकार असफल रही है। यह बयान इज़रायली सुरक्षा प्रतिष्ठान के भीतर बढ़ती असहमति का संकेत देता है।

उत्तरी क्षेत्रों के स्थानीय नेतृत्व ने भी अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है। मेरोम हागलील क्षेत्रीय परिषद के प्रमुख अमित सोफर ने इस बात पर आपत्ति जताई कि अमेरिका, खासकर डोनाल्ड ट्रंप, लेबनान मोर्चे को ईरान के साथ सीधे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुसार, इससे जमीनी हालात और अधिक जटिल हो सकते हैं और स्थानीय सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।

इसके अलावा, उत्तरी बस्तियों के कई परिषद प्रमुखों ने अभूतपूर्व विरोध दर्ज करते हुए कहा कि वे “सफेद झंडे” लहराएंगे। यह क़दम प्रतीकात्मक रूप से नेतन्याहू सरकार की “आत्मसमर्पण जैसी स्थिति” को दर्शाने के लिए बताया जा रहा है। इन नेताओं का कहना है कि लगातार तनाव और हमलों के बावजूद सरकार उनके लिए पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाई।

विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति नेतन्याहू के लिए राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण बन सकती है। एक ओर सुरक्षा का मुद्दा है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक असंतोष तेजी से बढ़ रहा है। यदि यह असंतोष इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में इज़रायल की आंतरिक राजनीति में और भी उथल-पुथल देखने को मिल सकती है।

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