डोनाल्ड ट्रंप, एक ऐसा राष्ट्रपति जिसे इतिहास झूठे बयानों के लिए याद रखेगा
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे नेता के रूप में मशहूर हो चुके हैं, जिनकी बातों पर खुद उनके परिवार के सदस्य भी भरोसा नहीं कर सकते। झूठ बोलने पर अगर नोबेल पुरस्कार मिलता, तो उसके सही हकदार डोनाल्ड ट्रंप होते। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप इसकी बजाय नोबेल शांति पुरस्कार के पीछे भागते रहे, वह भी ऐसे समय में जब वह सीरिया, लेबनान और ईरान में अशांति फैला चुके थे।
ईरान के सुप्रीम लीडर की शहादत से पहले डोनाल्ड ट्रंप कई बार आयतुल्लाह खामेनेई की हत्या की धमकी दे चुके थे। यह धमकी वह दे रहा था, जो अपने आपको पूरी दुनिया में शांति दूत के रूप में पेश कर रहा था, लेकिन खुद उसे यह पता नहीं था कि किसी भी देश के चुने हुए प्रतिनिधि की हत्या की धमकी देना एक जघन्य अपराध है।
यह न केवल अंतरराष्ट्रीय नियमों और कूटनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अमेरिका किस तरह अपनी शक्ति का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करता है। जिस नेता को संवाद और शांति को बढ़ावा देना चाहिए था, वही टकराव और तनाव को हवा देता नजर आया।
ईरान के सुप्रीम लीडर की शहादत के बाद ईरान ने जिस तरीके से कतर, बहरीन, यूएई और सऊदी अरब में अमेरिकी एयरबेस को उड़ाया है, उसने ट्रंप को दिन में तारे दिखा दिए।
डोनाल्ड ट्रंप जंग से बाहर निकलने के बहाने तलाश करने लगे। इसी लिए वह ईरान की दस मांगों वाले प्रस्ताव पर दो हफ्ते के सीज़फायर पर तुरंत राज़ी हो गए। लेकिन जब इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच सीज़फायर की शर्तों पर बात करने के लिए बैठक शुरू हुई, तो अमेरिका अपने वादे से मुकर गया और बैठक बेनतीजा समाप्त हो गई।
पूरे घटनाक्रम में ईरान ने जिस धैर्य, रणनीतिक समझ और दृढ़ता का परिचय दिया, वह उल्लेखनीय रहा। उसने यह स्पष्ट किया कि वह किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
इन घटनाओं के बाद यह धारणा बनी कि ट्रंप युद्ध की स्थिति से बाहर निकलने के रास्ते तलाशने लगे। इसी क्रम में युद्धविराम (सीज़फायर) का प्रस्ताव सामने आया, जिसे उन्होंने अपेक्षाकृत जल्दी स्वीकार कर लिया। यह कदम कुछ लोगों को रणनीतिक लगा, जबकि अन्य के अनुसार यह दबाव में लिया गया निर्णय था। दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम को एक ऐसे प्रयास के रूप में देखा गया, जिससे तनाव को कम किया जा सके और आगे की बातचीत के लिए रास्ता बनाया जा सके।
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ होने वाले युद्ध में अपनी हार को पचा नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होंने सीज़फायर के जरिए युद्ध से बाहर निकलने का बहाना तलाश करना शुरू कर दिया, और दो हफ्ते का सीज़फायर उनके लिए सबसे अच्छा बहाना साबित हुआ।
कुल मिलाकर, ट्रंप की विदेश नीति और उनके बयानों को लेकर यह बहस जारी रही कि क्या वे वास्तव में शांति स्थापित करने के इच्छुक थे या उनके कदमों ने वैश्विक तनाव को और बढ़ाया। उनके समर्थक जहां उनके निर्णयों को साहसिक और निर्णायक बताते हैं, वहीं विरोधी उन्हें असंगत और जोखिमपूर्ण मानते हैं। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व और नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी मतभेद देखने को मिलते हैं।


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