स्कूलों को नफरत की नर्सरी मत बनाइये

स्कूलों को नफरत की नर्सरी मत बनाइये

एक तरफ हम चांद पर क़दम रख रहे हैं वहीं दूसरी ओर हम इंसानियत को शर्मसार करने की सारी हदें पार कर रहे हैं, कभी महिलाओं को निर्वस्त्र कर उनका जुलूस निकाल रहे हैं तो कभी उनके सिर से हिजाब नोचकर इंसानियत के चेहरे पर खरोंचें डाल रहे हैं। मॉब लिंचिंग द्वारा मानवता को पैरों तले रौंदा जा रहा है, अब यह सिलसिला शिक्षण संस्थानों तक पहुंच गया है।

जिस शिक्षक की जिम्मेदारी छात्रों को मानवता और नैतिकता की शिक्षा देना है, वह शिक्षक इसके विपरीत छात्रों के मासूम मन में धार्मिक नफरत का जहर घोल रहा है।जाति-बिरादरी के नाम पर दलितों और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के साथ यह खेल पहले से ही खेला जा रहा था और आज भी खेला जा रहा है। मुजफ्फरनगर जिले के मंसूरपुरा गांव के खब्बा का एक वीडियो सामने आया है

यह वीडियो सामने आ गया वर्ना न जाने ऐसे कितने प्राथमिक विद्यालय होंगे जहां इन मासूम छात्रों को धार्मिक नफरत की शिक्षा दी जा रही होगी और धर्म के आधार पर छात्रों को एक-दूसरे से अलग कर किया जा रहा होगा और उसके परिवार के सदस्यों को कक्षा में अपमानित होना पड़ रहा होगा।

मुज़फ्फरनगर स्कूल प्रशासन ने धर्म के आधार पर एक मुस्लिम छात्र को उसके साथी छात्रों के साथ न सिर्फ पिटवाया, बल्कि छात्रों के मन में धार्मिक नफरत के बीज भी बो दिए। वीडियो देखकर महिला टीचर का रवैया किसी भी हिसाब से शिक्षा देने वाला नहीं था, बल्कि यह एक धर्म विशेष के प्रति घृणा और शत्रुता की भावना का प्रकटीकरण है।

महिला शिक्षक का अपराध केवल यह नहीं है कि उसने निर्दोष छात्रों को धार्मिक घृणा की ओर अग्रसर किया, बल्कि उसने समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने और सांप्रदायिक तनाव फैलाने का भी अपराध किया है। क्या महिला टीचर यह नहीं जानती थी कि किसी भी छात्र को उसके सहपाठियों से पिटवाया नहीं धमकाया नहीं जा सकता? उसे शारीरिक क्षति नहीं पहुंचाई जा सकती? यह कानूनन अपराध है।

महिला टीचर अपने दूसरे छात्रों से जिस समय मुस्लिम छात्र की पिटाई करवाई और उसके चेहरे पर थप्पड़ और उसकी पीठ पर मुक्के लगवाए वह छात्र बेबस और असहाय होकर वहीं खड़ा रहा। महिला टीचर ने खुद बयान दिया था कि मुस्लिम छात्र के घर वालों ने उस से कहा था की बच्चे पर सख़्ती करें। उस बच्चे के घर वालों ने अवश्य कहा होगा, क्योंकि उन्होंने आपको हिन्दू या मुस्लिम नहीं समझा था बल्कि आपको एक टीचर समझा था जिसका काम मानवता की शिक्षा देना है।

अगर यह बच्चों के बीच मारपीट का मामला होता तो जिसे पीटा जा रहा है वह भी हाथ-पैर मार रहा होता, लेकिन वीडियो से यह नहीं लग रहा कि यह छात्रों के बीच मारपीट का मामला है। जिन छात्रों ने अपने साथी छात्रों की पिटाई की है,वह छात्र दोषी नहीं है बल्कि दोषी वह है टीचर है जिसने पीटने का आदेश दिया था। अगर बात यहीं ख़त्म हो जाती तो भी इसकी व्याख्या की जा सकती थी लेकिन महिला टीचर ने छात्र के परिवार के नाम पर मुस्लिम महिलाओं के बारे में जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, वह उसकी की गंदी मानसिकता का प्रतीक है।

यह एक विशेष प्रशिक्षण और एक विशेष मानसिकता की दें है जिस वातावरण में उनका पालन-पोषण हुआ है और जो उनके दिमाग में डाला गया है। तो क्या ऐसे ऐसी टीचर को कानून के तहत सजा नहीं मिलनी चाहिए? या इसे बच्चों का मामला कहकर ख़त्म कर देना चाहिए ? और अगर इसे ख़त्म कर दिया जाए तो उस बच्चे के साथ कैसे इंसाफ़ होगा जिसने इतनी तकलीफ़ और इतना कष्ट सहा जिसे देख कर हर व्यक्ति की आंखें नाम हो गईं?

राहुल गांधी का यह कहना 100% सही है कि एक शिक्षक देश के लिए इससे बुरा कुछ नहीं कर सकता कि वह मासूम बच्चों के दिमाग में जहर भर दे और स्कूल जैसी पवित्र जगह को नफरत का बाजार बना दे। आख़िर कहां है राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग, जिसने दिल्ली की एक अज्ञात संस्था ‘मानू शि सदन’ की फर्जी शिकायत पर दारुल उलूम देवबंद जैसी विश्व प्रसिद्ध संस्था को नोटिस भेजकर पूछा था कि बच्चों को गलत शिक्षा क्यों दी जा रही है?

मुज़फ्फर नगर स्कूल में एक छात्र को उसके साथी छात्रों से किस तरह बेरहमी से पीटावाया गया, इस मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने कोई पहल क्यों नहीं की और क्या यह मानवता का अपमान नहीं है? राहुल गांधी या अखिलेश सिंह यादव जैसे नेताओं की चिंता वाजिब है। किसी ने कभी नहीं सोचा था कि मासूमों के दिमाग में इस हद तक जहर भर दिया जाएग।

वह स्कूल जहां मन में ज्ञान के दीपक जलाए जाते हैं, अच्छे-बुरे का फर्क सिखाया जाता है और अच्छे संस्कार सिखाए जाते हैं, उस स्कूल में छात्रों के मन में एक-दूसरे के खिलाफ नफरत के बीज बोए जा रहे हैं। स्कूलों को नफरत की नर्सरी बनाया जा रहा है। अगर इसे नहीं रोका गया और इसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई गई तो यह शैक्षिक पिछड़ेपन का कारण बन जाएगा

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