रूसी तेल को लेकर भारत को जोर का झटका देने की तैयारी में अमेरिका

नई दिल्ली: रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ने की आशंका तेज हो गई है। अमेरिका की सीनेट में एक द्विदलीय (Bipartisan) विधेयक को 60 से अधिक सीनेटरों का समर्थन मिलने की खबर सामने आई है। इस प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर यह विधेयक कानून बन जाता है तो रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों, जिसमें भारत भी शामिल है, पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है।

हालांकि, इस विधेयक को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से पारित होना होगा और इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी भी जरूरी होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि सीनेट में मिले समर्थन के बाद यह प्रस्ताव पहले की तुलना में आगे बढ़ा है, लेकिन इसके कानून बनने की प्रक्रिया अभी बाकी है।

यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस की ऊर्जा आय से जुड़े मामलों पर नजर रख रहे हैं। पश्चिमी देशों का आरोप है कि रूस से तेल खरीद उसकी अर्थव्यवस्था को समर्थन देती है और इससे युद्ध संबंधी गतिविधियों को आर्थिक मदद मिल सकती है।

भारत ने लगातार कहा है कि उसकी ऊर्जा नीति देश की जरूरतों और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। नई दिल्ली का तर्क है कि सस्ती ऊर्जा खरीद भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के हित में है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है।

अगर अमेरिकी प्रस्ताव कानून का रूप लेता है और भारत पर टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर व्यापार, ऊर्जा लागत और भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ सकता है।

इस विधेयक को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों का समर्थन मिलना अमेरिकी राजनीति में रूस पर सख्त रुख का संकेत माना जा रहा है। हालांकि, इसके प्रावधानों, संभावित प्रभावों और लागू करने के तरीके को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं।

अब सभी की नजर अमेरिकी कांग्रेस की आगे की प्रक्रिया और व्हाइट हाउस के रुख पर है। यदि यह विधेयक मंजूर होकर कानून बनता है, तो रूस के साथ ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों के लिए नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।

फिलहाल भारत की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई बड़ा आधिकारिक कदम सामने नहीं आया है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक समीकरणों में इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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