चाबहार पर हमले से भारत की चिंता बढ़ी, पाकिस्तान को मिलेगा फायदा

तेहरान: ईरान के चाबहार बंदरगाह पर अमेरिकी हमलों ने भारत के लिए नई भू-राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यह बंदरगाह भारत की क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा रहा है, क्योंकि इसके जरिए भारत पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की कोशिश करता रहा है।

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच चाबहार पोर्ट को निशाना बनाए जाने से भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि भारत फिलहाल इस बंदरगाह का प्रत्यक्ष संचालन नहीं कर रहा है, लेकिन यहां किए गए उसके बड़े निवेश और भविष्य की योजनाओं पर इसका असर पड़ सकता है।

चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में मकरान तट पर स्थित है और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से करीब 170 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत के लिए इसकी अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह समुद्री मार्ग के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराता है।

भारत ने पिछले वर्षों में चाबहार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साल 2024 में भारत और ईरान के बीच शहीद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन को लेकर 10 साल का समझौता भी हुआ था। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को अपने संचालन से जुड़े कदमों में सावधानी बरतनी पड़ी।

विशेषज्ञों का मानना है कि ताजा हमलों से भारत की किसी मौजूदा सक्रिय सुविधा पर तत्काल बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन चाबहार परियोजना के दीर्घकालिक भविष्य पर सवाल जरूर खड़े हो गए हैं। यह बंदरगाह भारत के लिए केवल व्यापारिक परियोजना नहीं बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया में अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ाने का माध्यम रहा है।

चाबहार को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिसके जरिए भारत रूस, ईरान और मध्य एशिया के साथ संपर्क मजबूत करना चाहता है।

वहीं, चाबहार को लेकर भारत की मुश्किलें पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकती हैं। भारत की सक्रियता बढ़ने से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह और चीन की क्षेत्रीय भूमिका को चुनौती मिलती थी। अब अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य तनाव के कारण चाबहार की गति धीमी पड़ने से इस समीकरण में बदलाव आ सकता है।

फिलहाल भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चाबहार को लंबे समय तक चलने वाली भू-राजनीतिक अस्थिरता से कैसे बचाया जाए, ताकि यह परियोजना क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हितों का आधार बनी रह सके।

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