नई दिल्ली : पश्चिम एशिया और यूरोप को जोड़ने वाले महत्वाकांक्षी इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को लेकर सऊदी अरब एक नए विकल्प पर विचार कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, रियाज़ इस परियोजना के मौजूदा रास्ते में बदलाव की संभावना तलाश रहा है, जिसमें इस्राईल की जगह सीरिया को शामिल करने का विकल्प सामने आया है।
दरअसल, गाजा युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की राजनीतिक स्थिति पूरी तरह बदल गई है। युद्ध से पहले सऊदी अरब और इस्राईल के बीच संबंधों को सामान्य करने की कोशिशें तेज थीं, लेकिन गाजा में बड़े पैमाने पर हुई तबाही के बाद रियाज़ ने इस प्रक्रिया से दूरी बना ली। इसी बदले माहौल का असर अब IMEC जैसी बड़ी आर्थिक योजना पर भी पड़ सकता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी नेतृत्व इस बात पर विचार कर रहा है कि खाड़ी देशों को भूमध्य सागर से जोड़ने वाला रास्ता इस्राईल के बजाय सीरिया से होकर गुजरे। इस योजना के तहत एक नया जमीनी संपर्क मार्ग तैयार किया जा सकता है, जो अरब देशों को यूरोप तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्ता देगा।
हालांकि अभी यह सिर्फ एक प्रस्तावित विकल्प है और अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा।
IMEC की मूल योजना में भारत से आने वाला माल समुद्री और रेल नेटवर्क के जरिए संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन और इस्राईल होते हुए यूरोप पहुंचाने की बात थी। इस्राईल का हैफा बंदरगाह इस पूरे नेटवर्क में एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा था।
इस परियोजना को केवल व्यापारिक गलियारा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के एक बड़े प्रयास के रूप में देखा गया था। इसमें भारत, खाड़ी देशों और यूरोप के बीच तेज और भरोसेमंद व्यापार मार्ग बनाने की उम्मीद जताई गई थी।
अगर IMEC का मार्ग सीरिया से होकर जाता है तो इस्राईल को इससे बाहर रखा जा सकता है। इससे तल अवीव की वह उम्मीद कमजोर हो सकती है कि यह परियोजना उसे एशिया और यूरोप के बीच एक प्रमुख लॉजिस्टिक केंद्र बना देगी।
सऊदी अरब के लिए यह कदम क्षेत्रीय राजनीति में संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गाजा और लेबनान में संघर्ष के बाद रियाज़ इस्राईल से दूरी बनाए रखते हुए अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहता है।
भारत ने IMEC को वैश्विक व्यापार और कनेक्टिविटी के लिहाज से एक महत्वपूर्ण अवसर माना है। लेकिन रास्ते में बदलाव होने पर परियोजना की गति, लागत और रणनीतिक महत्व पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल IMEC का भविष्य पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति पर काफी हद तक निर्भर करता है। सऊदी अरब का अगला कदम इस पूरे कॉरिडोर की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।


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