जब तक ईरान की शर्तें पूरी नहीं होंगी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य नहीं खुलेगा: क़ालिबाफ़
ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने संसद के एक खुले सत्र में कहा कि जब तक ईरान की प्रमुख शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने और पिछली परिस्थितियों में बातचीत बहाल करने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान ने अपनी मांगों और शर्तों को मध्यस्थों के माध्यम से संबंधित पक्षों तक स्पष्ट रूप से पहुंचा दिया है।
क़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरान के अनुसार, उसके वैध अधिकारों को मान्यता मिलना और अमेरिका द्वारा किए गए दायित्वों का पालन किया जाना आवश्यक है। उनके मुताबिक, जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, ईरान बातचीत की पुरानी स्थिति में वापस नहीं लौटेगा और होर्मुज़ जलडमरूमध्य भी नहीं खोला जाएगा।
अपने भाषण में क़ालिबाफ़ ने ईरान-इराक़ युद्ध की शुरुआत और “पवित्र रक्षा सप्ताह” का उल्लेख करते हुए कहा कि अतीत में ईरानी जनता के प्रतिरोध ने देश की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत किया। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों की तुलना उस ऐतिहासिक दौर से करते हुए कहा कि आज भी ईरान का प्रतिरोध देश की सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक व्यवस्था में बदलाव का कारण बन सकता है।
उन्होंने स्कूलों के दोबारा खुलने को भी राष्ट्रीय प्रतिरोध और भविष्य की तैयारी से जोड़ा। उनके अनुसार, शिक्षा और ज्ञान का निरंतर विकास इस बात का संकेत है कि देश युद्ध और दबाव के बावजूद सामान्य जीवन, उत्पादन और शिक्षा को जारी रख रहा है।
क़ालिबाफ़ ने देश के राजनीतिक और बौद्धिक वातावरण में मौजूद दो दृष्टिकोणों की आलोचना की। उनके अनुसार, एक पक्ष युद्ध तो चाहता है, लेकिन उसके शांतिपूर्ण और मज़बूत अंत की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं रखता। दूसरा पक्ष ईरान की राष्ट्रीय शक्ति को कम आंकते हुए दुश्मन की शर्तों को स्वीकार करने की दिशा में जाता है। उन्होंने कहा कि दोनों दृष्टिकोण देश की एकता और राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
क़ालिबाफ़ ने कहा कि, ईरान के लिए युद्ध और बातचीत एक-दूसरे के विरोधी विकल्प नहीं हैं। उनके अनुसार, देश को अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करते हुए दबाव का सामना करना चाहिए और उचित समय आने पर कूटनीति के माध्यम से हासिल की गई सैन्य या राजनीतिक बढ़त को मजबूत करना चाहिए।
अंत में उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में पुरानी अमेरिकी व्यवस्था कमज़ोर हो चुकी है और क्षेत्र के इस्लामी देशों को एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था बनाने में भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ईरान का भविष्य “विनती” के बजाय तर्क, साहस, प्रतिरोध और राष्ट्रीय शक्ति के आधार पर तय होगा।


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