सीएनएन का नया दावा: मीनाब स्कूल पर हमले के समय अमेरिकी सेना ने सभी चुनौतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया

सीएनएन का नया दावा: मीनाब स्कूल पर हमले के समय अमेरिकी सेना ने सभी चुनौतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया

अमेरिकी सरकार अब तक ईरान के मीनाब शहर स्थित शजरिये तय्यिबा प्राथमिक विद्यालय पर हुए हमले के बारे में आधिकारिक रूप से चुप्पी साधे हुए है। इस बीच अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन ने इस मामले में एक नया दावा किया है।

सीएनएन ने तीन जानकार सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि, 28 फ़रवरी 2026 को ईरान पर हमले के दिन अमेरिकी सेना के वरिष्ठ कमांडरों ने उन चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर दिया था, जिनमें कहा गया था कि ईरान के संभावित सैन्य ठिकानों से संबंधित खुफिया जानकारी काफ़ी पुरानी हो चुकी है और उस पर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है। इसके बावजूद उसी पुरानी जानकारी के आधार पर कार्रवाई की गई।

हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने अब तक इन दावों की न तो पुष्टि की है और न ही उनका खंडन किया है। वहीं ईरानी अधिकारियों का कहना है कि, मीनाब के विद्यालय पर हमला अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

मीनाब स्कूल पर हमला: मानवता की हार और वैश्विक ताकतों का दोहरा रवैया

मीनाब स्कूल पर हुए दर्दनाक हमले ने एक बार फिर पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। एक ऐसी जगह जहाँ मासूम बच्चे और लोग शरण और शिक्षा की उम्मीद में जाते हैं, उसे निशाना बनाना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है। इस दिल दहला देने वाली घटना ने न केवल मानवता को शर्मसार किया है, बल्कि इस्राईल और अमेरिका की उन नीतियों को भी पूरी दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया है जिन्हें ‘मानवाधिकारों’ के पर्दे के पीछे छिपाया जाता है।

मीनाब स्कूल पर हुआ हमला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि, अमेरिका और इस्राईल की निगाह में आम नागरिकों और मासूम बच्चों की जान का कोई मूल्य नहीं है। इस क्रूरता ने उस चेहरे को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है जो ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर अत्याचार की सारी हदें पार कर चुका है।

अमेरिका का दोहरा मापदंड

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल अमेरिका की भूमिका पर उठते हैं। जो अमेरिका खुद को पूरी दुनिया में ‘मानवाधिकार’ और ‘लोकतंत्र’ का सबसे बड़ा रक्षक बताता है, वही आज इस नृशंसता पर मूक दर्शक बना हुआ है। सिर्फ खामोश ही नहीं, बल्कि लगातार हथियारों की आपूर्ति और संयुक्त राष्ट्र में वीटो (Veto) शक्ति का इस्तेमाल करके वह इस अत्याचार में बराबर का भागीदार बन चुका है। मीनाब स्कूल के मलबे में बिखरे हुए खिलौने और किताबें अमेरिका की इस दोहरी नीति (पाखंड) पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न हैं।

इस घटना ने साबित कर दिया है कि जब तक ताकतवर देशों के स्वार्थ जुड़े होते हैं, तब तक मासूमों का खून पानी की तरह बहने दिया जाता है। दुनिया अब इन वैश्विक ताकतों के असली चेहरे को पहचान चुकी है, और आने वाली पीढ़ियां इस अमानवीयता और अंतरराष्ट्रीय चुप्पी को कभी माफ नहीं करेंगी। समय आ गया है कि पूरी दुनिया इस अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करे।

बता दें कि, ईरान के मीनाब स्कूल पर अमेरिका और इस्राईल के नाजायज़ हमलों में 168 स्कूली छात्राएं शहीद हुई थीं। इन छात्राओं की शहादत के बाद अमेरिका और इस्राईल की पूरी दुनिया में थूथू हो रही है।यह हमला सिर्फ किसी एक इमारत या लोगों के समूह पर नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के मुंह पर एक तमाचा है।

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