ब्रिटेन ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल हुआ तो संघर्ष का दायरा और बढ़ेगा

मॉस्को: ईरान के खिलाफ ब्रिटेन के युद्ध में कूदने की अटकलों पर रूसी मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि ब्रिटेन सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष और व्यापक हो सकता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, रूसी अख़बार ‘इज़वेस्तिया’ में व्लादिस्लाव पेत्रोव और यूलिया लियोनोवा ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध में ब्रिटेन की संभावित प्रत्यक्ष भागीदारी के परिणामों का विश्लेषण किया है।

रूस की फेडरेशन काउंसिल की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष ग्रिगोरी करासिन ने इज़वेस्तिया से बातचीत में कहा कि पश्चिम में ऐसा एक गुट बन रहा है जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा है। रिपोर्टों के अनुसार, ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने अमेरिका को ईरान पर हमलों के लिए ब्रिटिश सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति दी है।

सैन्य विशेषज्ञ दिमित्री कोर्निएव का कहना है कि बर्नहम का यह फैसला मौजूदा रणनीतिक स्थिति को ही जारी रखता है। उनके अनुसार, वाशिंगटन के लिए कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है और पेंटागन पहले की तरह मध्य पूर्व में अपने अभियानों के लिए ब्रिटिश ढांचे का उपयोग करता रहेगा।

हालांकि, रूसी स्रोत का कहना है कि अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ब्रिटेन पूरी तरह इस युद्ध में शामिल हो गया है। मध्य पूर्व में उसकी सैन्य क्षमता सीमित है, इसलिए वह अधिकतम अमेरिकी सेना को प्रतीकात्मक समर्थन ही दे सकता है। यह समर्थन ईरानी ड्रोन को रोकने या सहायता केंद्रों की सुरक्षा तक सीमित रह सकता है।

कोर्निएव ने निष्कर्ष निकाला कि लंबे समय से रक्षा बजट में कटौती और सेना के आकार में कमी के कारण ब्रिटेन के पास बड़े पैमाने के सैन्य अभियान चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन की भूमिका मुख्य रूप से सैन्य ढांचे और लॉजिस्टिक सहायता तक सीमित रहेगी तथा वह अमेरिका के लिए एक लॉजिस्टिक केंद्र के रूप में काम करता रहेगा। हालांकि, वाशिंगटन और लंदन के बीच घनिष्ठ समन्वय से समाधान में देरी हो सकती है, क्योंकि तेहरान ने कई बार दिखाया है कि वह दबाव के बावजूद अपने हितों की दृढ़ता से रक्षा करने में सक्षम है।

रूसी स्रोत ने यह भी चेतावनी दी कि इस स्थिति के प्रभाव मध्य पूर्व से बाहर भी फैल सकते हैं। यदि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच सैन्य सहयोग और बढ़ता है, तो वे इसी मॉडल को अन्य भू-राजनीतिक तनाव वाले क्षेत्रों में भी लागू कर सकते हैं। विशेष रूप से यूरोप के लिए यह महत्वपूर्ण है, जहां पश्चिमी नेता ‘रूस के खतरे’ का हवाला देकर अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

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