“आयतुल्लाह ख़ामेनेई” एक ऐसा सुप्रीम लीडर, जो न किसी ज़ालिम हुकूमत से डरा, न किसी के सामने झुका
आज पूरी दुनिया की ज़ुबान पर, चाहे औरत हो या मर्द, बूढ़ा हो या बच्चा, बस एक ही नाम गूंज रहा है — अली ख़ामेनेई।
ईरान का वह सुप्रीम लीडर जो न किसी से डरा न दबा, न किसी के सामने झुका न बंकरों में छिपा। जिसने शहीद होकर भी अपने देश और अपनी क़ौम का सिर पूरी दुनिया में बुलंद कर दिया। एक ऐसे लीडर जिनके नज़दीक मौत हलाकत नहीं बल्कि शहादत थी। जिसने अपने वक़्त की सुपर पावर ताक़तों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
वह एक ऐसा मज़बूत क़िला था, जिसमें घुसने की ताक़त किसी भी अहंकारी शासक के अंदर नहीं थी। वह अपने देश और अपने विचारों के लिए जान क़ुर्बान करने के लिए तैयार था। उसे उस वक़्त धोखे से शहीद किया गया जब वह दुनिया के अहंकारी शासकों की धमकियों से बेपरवाह अपने घर में इत्मीनान से बैठा हुआ था। वह शहादत का इस तरह इंतज़ार कर रहा था जैसे कोई अपने घर के दरवाज़े पर खड़े होकर किसी मेहमान का स्वागत करता है।
आज पूरी दुनिया उसके ग़म में उदास है। ईरान, तेहरान, क़ुम, नजफ़ और कर्बला तक करोड़ों की संख्या में लोग उसके जनाज़े में खड़े होकर उसे आख़िरी विदाई दे रहे हैं। उसके जनाज़े में उमड़े जनसैलाब को देखकर उन पर तानाशाही का आरोप लगाने वाले सभी तानाशाह हैरान खड़े हाथ मल रहे हैं।
ईरान, इराक़, तेहरान, क़ुम, नजफ़ और कर्बला में उनके जनाज़े में शामिल करोड़ों लोग “अमेरिका मुर्दाबाद” और “इस्राईल मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे हैं।
यह कौन शहीद है जो मरने के बाद भी ज़िंदा हो गया?
आज ट्रम्प और नेतन्याहू सोच रहे होंगे कि हमने तो इसे ख़त्म कर दिया था, तो फिर यह ज़िंदा कैसे हो गया? हम तो इस पर तानाशाह होने का आरोप लगाते थे, फिर इसके जनाज़े में करोड़ों की संख्या में पूरी दुनिया के लोग कहाँ से आ गए? क्या हमारा मंसूबा और प्रोपेगेंडा फ़ेल हो गया? हमने तो अली ख़ामेनेई को शहीद कर दिया था, फिर ये करोड़ों की संख्या में अली ख़ामेनेई कहाँ से पैदा हो गए?
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई के जनाज़े में उमड़े जनसैलाब ने साबित कर दिया कि असली हाकिम वह होता है जो लोगों के जिस्मों पर हुकूमत नहीं करता बल्कि जनता के दिलों पर हुकूमत करता है। जो जिस्मों पर हुकूमत करते हैं, वे मिट जाया करते हैं, लेकिन जो दिलों पर हुकूमत करते हैं, वे हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
मौत उसकी है करे जिसका ज़माना अफ़सोस,
यूँ तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए
आज मीनाब स्कूल की 168 छात्राओं के क़ातिल जनता की अदालत में ख़ामोश खड़े हैं। उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि ईरान पर आतंकियों को सहयोग देने का झूठा आरोप लगाने वालों ने ईरान पर इतना बड़ा आतंकी हमला क्यों किया? उन मासूम बच्चियों का क्या क़ुसूर था जो सुबह-सुबह अपनी पीठ पर किताबों का बैग लेकर स्कूल गई थीं?
आज अमेरिका और इस्राईल की बौखलाहट साफ़ नज़र आ रही है। ईरान की सरकार को वॉशिंगटन से चलाने का ख़्वाब देखने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी ही हुकूमत को बचाने के लिए अपने ही देश की जनता पर बल प्रयोग कर रहे हैं।
आज उनकी जनता उनसे पूछ रही है कि तुमने ईरान के सुप्रीम लीडर को क्यों शहीद किया? वार्ता के बीच उन पर धोखे से हमला क्यों किया? मीनाब स्कूल की 168 मासूम छात्राओं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? तुमने उन्हें बेदर्दी के साथ क्यों शहीद किया? इस हमले का मक़सद क्या था? क्या तुम अपने मक़सद में कामयाब हुए? क्या ईरान में तुमने रेजीम चेंज कर दिया? क्या ईरान तुम्हारे सामने झुक गया?
जब ऐसा कुछ नहीं हुआ, तो तुम लोग हर रोज़ यह झूठा बयान क्यों देते हो कि “हम जीत गए, हम कामयाब हो गए?”


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