अमेरिका की सत्ता से विदा हो रहे डोनाल्ड ट्रम्प जहाँ एक ओर इस्राईल के लिए कई लाभदायी क़दम उठा चुके हैं वहीँ ईरान और मीडिल ईस्ट समेत उत्तरी अफ्रीका को लेकर कई गंभीर क़दम भी उठा चुके हैं। एक ओर जहाँ उनके फैसलों से इस्राईल को मज़बूती मिल रही है वहीँ नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के रास्ते में मुश्किलें खड़ी होती जा रही है।
अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में ट्रम्प प्रशासन ने मध्य पूर्व में अपनी विदेश नीति की छाप छोड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं।
बीते दिनों अमेरिका ने यमन जनांदोलन अंसारुल्लाह को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया जबकि एक इराकी सैन्य अधिकारी और कई ईरानी संगठनों पर पाबंदियां लगी दीं। इससे पहले दिसंबर में अमेरिका ने पश्चिमी सहारा इलाके के विवादित क्षेत्र पर मोरक्को की संप्रभुता को मान्यता दे दी।
इन सभी कदमों के जरिए ईरान को अधिक से अधिक अलग थलग और क्षेत्र में इस्राईल को मजबूत करने की कोशिश की गई है। लेकिन ट्रम्प को सबसे अधिक आलोचना यमन के बारे में किए गए फैसले को लेकर झेलनी पड़ रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि अंसारुल्लाह को आतंकवादी संगठन घोषित करने से युद्धग्रस्त यमन में काम कर रही सहायता एजेंसियां प्रभावित होंगी। संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी ने कहा कि इससे वहां “इतने बड़े पैमाने पर सूखा पड़ सकता है जिसे हमने पिछले 40 साल से ना देखा हो।”
वहीँ मोरक्को का विवाद दुनिया के सबसे पुराने विवादों में से एक है। दिसंबर में जब अमेरिका ने पश्चिमी सहारा पर मोरक्को की संप्रभुता को मान्यता दी तो इसका कड़ा विरोध हुआ। शायद ऐसा करके अमेरिका ने मोरक्को को इस्राईल के साथ फिर से राजनयिक संबंध कायम करने का इनाम दिया है।
विदेश मामलों पर यूरोपीय परिषद में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका कार्यक्रम निदेशक जूलियन बारनेस-डेकेय कहते हैं कि “ट्रम्प घरेलू राजनीति का विदेश नीति के साथ बहुत बुरे तरीके से घालमेल कर रहे हैं। वह लोग एक तरह की विरासत छोड़कर जाना चाहते हैं। वह अमेरिका को ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा करना चाहते हैं जिसे बाइडन पलट ना पाएं। ”
लेकिन क्या बाइडन इन सब कदमों को पलट पाएंगे? ऐसा अगर संभव भी हुआ तो यह प्रक्रिया कितनी जटिल और कितनी लंबी होगी? बर्लिन के हार्टी इंस्टीट्यूट में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर मारिना हेंके कहती हैं, “सैद्धांतिक रूप से कुछ बदलाव तो तुरंत हो सकते हैं। तकनीकी रूप से बहुत से बदलाव एक ही दिन में हो सकते हैं।”
मिसाल के तौर पर मोरक्को और पश्चिमी सहारा को लेकर फैसला एक घोषणा के रूप में था। इसे कानून का रूप नहीं दिया गया है। नए राष्ट्रपति एक नई घोषणा के जरिए इसे पलट सकते है। इसी तरह ट्रंप के अध्यादेशों की जगह नए अध्यादेश लाकर उन्हें बदला जा सकता है।
वहीं किसी को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किए जाने का मामला थोड़ा जटिल है। यह प्रक्रिया इस तरह होती है: सबसे पहले विदेश मंत्री को घोषणा करनी होती है कि वह ऐसा कुछ करने जा रहे हैं। फिर इस पर आपत्ति दर्ज करने के लिए कांग्रेस के सदस्यों के पास सात दिन का समय होता है। अंसारुल्लाह के मामले में कांग्रेस के पास बीते रविवार तक का समय था, लेकिन कोई आपत्ति नहीं आई।
हेंके कहती हैं, “निश्चित तौर पर कांग्रेस दूसरे कामों में व्यस्त थी। इसलिए यह मामला थोड़ी समस्या पैदा कर सकता है।” मौजूदा अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने विदेश नीति के इर्द गिर्द ऐसा आवरण तैयार कर दिया है कि उसमें एकदम से छेड़छाड़ अमेरिकी मतदाताओं को नाराज कर सकती है, खासकर ईरान, चीन और क्यूबा से जुड़े मुद्दों पर।
हेंके कहती हैं, “अगर बाइडन बहुत तेजी से कदम उठाएंगे तो रिपब्लिकन को लगेगा कि वह आतंकवादियों से वार्ता करने की तरफ बढ़ रहे हैं। कांग्रेस का एक भी सदस्य नहीं चाहेगा कि किसी को ऐसा लगे। लेकिन अगर वे ज्यादा ही इंतजार करेंगे तो राष्ट्रपति एक झटके में अपनी कलम से इसे बदल देंगे।”
ट्रम्प प्रशासन ने विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ ऐसे भी कदम उठाए हैं जिन्हें पलटने के बारे में बाइडन प्रशासन नहीं सोचेगा। बारनेस-डेकेय कहते हैं, “इस्राईल के साथ अरब देशों के सामान्य होते संबंधों को दोनों ही पार्टियों का समर्थन हासिल है।” वह कहते हैं कि अमेरिकी दूतावास को यरुशलम से वापस तल अवीव ले जाने की संभावना नहीं दिखती।
ईरान का मुद्दा भी अमेरिका के नए प्रशासन के लिए बहुत अहम है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में मध्य पूर्व केंद्र के सीनियर फैलो इयान ब्लैक कहते हैं, “मेरी राय में मुख्य मुद्दा है ईरानी डील में वापस लौटना। इसके लिए बहुत ज्यादा दबाव है। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने बहुत मेहनत की है कि खाड़ी के देश इस्राईल के करीब जाएं और ईरान के खिलाफ रहें।”
विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ईरानी परमाणु डील की समीक्षा में लंबा समय लगेगा। ईरानी संगठनों और ईरानी अधिकारियों पर लगे प्रतिबंधों की जटिल परतें हैं। इनमें से कई प्रतिबंध मई 2018 में अमेरिका के डील से हटने से पहले लगाए गए और कई उसके बाद। इन सब पर विचार करने में समय लगेगा। शायद एक साल। इस बारे में जल्दबाजी की उम्मीद कर रहे लोगों को निराशा हाथ लग सकती है।


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