इस्लामाबाद : पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर पिछले करीब 60 घंटों में चीन और तुर्की के सैन्य परिवहन विमानों की लगातार आवाजाही ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारी सैन्य विमान पाकिस्तान के प्रमुख एयरबेस पर पहुंचे हैं। इस गतिविधि को संभावित रक्षा आपूर्ति से जोड़कर देखा जा रहा है, हालांकि विमानों में क्या सामान था, इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, चीनी सैन्य परिवहन विमानों की गतिविधि रावलपिंडी के नजदीक स्थित नूर खान एयरबेस और कराची के मसरूर एयरबेस पर देखी गई। कम समय के भीतर सैन्य विमानों की कई आवाजाही ने इसलिए ध्यान खींचा है क्योंकि ये दोनों पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों में शामिल हैं।
इसी अवधि में तुर्की के सैन्य परिवहन विमानों की गतिविधियां भी सामने आने की बात कही जा रही है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि पाकिस्तान को ड्रोन या अन्य सैन्य उपकरणों की आपूर्ति की जा सकती है। हालांकि अभी तक किसी विशेष ड्रोन, हथियार प्रणाली, मॉडल या उसकी संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पाकिस्तान और चीन के रक्षा संबंध लंबे समय से गहरे हैं। लड़ाकू विमान, ड्रोन, वायु रक्षा और सैन्य तकनीक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। 2025 में भारत-पाकिस्तान सैन्य तनाव के दौरान भी चीन की पाकिस्तान को तकनीकी सहायता को लेकर चर्चा हुई थी।
ऐसे में चीनी सैन्य परिवहन विमानों की हालिया आवाजाही को सामान्य सैन्य संपर्क से आगे की गतिविधि मानने वाले कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन विमानों के जरिए वास्तव में कोई हथियार या ड्रोन पाकिस्तान पहुंचाया गया।
पाकिस्तान और तुर्की के बीच सैन्य रिश्ते भी हाल के वर्षों में तेजी से मजबूत हुए हैं। दोनों देश ड्रोन, नौसैनिक प्रणालियों और विमानन तकनीक समेत कई रक्षा क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं।
पाकिस्तानी वायुसेना के शीर्ष अधिकारियों की तुर्की यात्रा के दौरान रक्षा और एविएशन तकनीक से जुड़े मुद्दों पर उच्चस्तरीय बातचीत भी हुई है। इसके अलावा पाकिस्तान के इंजीनियरों और अधिकारियों की तुर्की के KAAN पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में भागीदारी को लेकर भी चर्चा होती रही है।
चीन और तुर्की की गतिविधियों को 7 अगस्त को हुए पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। समझौते के तहत किसी एक सदस्य पर हमला बाकी दोनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। तीनों देशों ने इसे रक्षात्मक व्यवस्था बताते हुए किसी विशेष देश को निशाना बनाने वाली संधि होने से इनकार किया है।
ऐसे समय में पाकिस्तान के साथ चीन की मौजूदा सैन्य साझेदारी और तुर्की के साथ बढ़ते रक्षा संबंधों का एक साथ सामने आना क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि पिछले करीब 60 घंटों में हुई इस असामान्य हवाई गतिविधि का वास्तविक उद्देश्य क्या था। जब तक उड़ानों के कार्गो या आधिकारिक मिशन की पुष्टि नहीं होती, तब तक ड्रोन अथवा अन्य हथियारों की आपूर्ति से जुड़ी बातें अटकलों के स्तर पर ही रहेंगी।


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