हिमंता बिस्वा सरमा के ख़िलाफ़ याचिका पर कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

हिमंता बिस्वा सरमा के ख़िलाफ़ याचिका पर कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

असम में बांग्ला बोलने वाले मुस्लिमों को अपमानजनक तरीके से “मियाँ” कहकर संबोधित करने और उनके खिलाफ नफरत फैलाने के आरोपों के चलते मुख्यमंत्री सरमा हिमंता बिस्वा के खिलाफ दायर याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की बेंच सुनवाई करेगी।

यह याचिका CPI और CPM ने असम की बीजेपी इकाई द्वारा पोस्ट किए गए उस वीडियो के खिलाफ दायर की है, जिसमें हिमंता बिस्वा सरमा को मुस्लिमों को गोली मारते हुए दिखाया गया है। AI से बनाया गया इस वीडियो का शीर्षक “पॉइंट ब्लैंक टारगेट” रखा गया था और इसके साथ “नमर्सी” यानी कोई दया नहीं, का कथन इस्तेमाल किया गया।

सोमवार को इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोये मल्लिक बघची की बेंच करेगी। 10 फरवरी को एडवोकेट निज़ाम पाशा ने चीफ जस्टिस से तत्काल सुनवाई की अपील की थी, जिस पर उन्होंने कहा था कि जब चुनाव होता है तो इसका कुछ हिस्सा सुप्रीम कोर्ट में भी लड़ा जाता है।

इस वीडियो के खिलाफ CPI (मार्क्सवादी) और अयनी राजा ने दो याचिकाएं दायर की थीं। तीसरी याचिका असम के 4 प्रमुख व्यक्तियों ने दायर की है, जिसमें उन्होंने हिमंता बिस्वा सरमा पर मुस्लिमों के खिलाफ उकसावे का आरोप लगाया है। इसके अलावा 12 अन्य लोगों ने अलग से याचिका दायर की है, जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा मुस्लिमों को “मियाँ” और “जिहादी” कहे जाने का हवाला दिया गया है।

इस याचिका का दायरा व्यापक है, क्योंकि इसमें हिमंता बिस्वा सरमा के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजय डोभाल के बयानों का भी जिक्र किया गया है। अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा फैलाए जाने वाले नफरत भरे भाषणों पर दिशा-निर्देश जारी करे।

पिछले सप्ताह जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिंद की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। उल्लेखनीय है कि 27 जनवरी को हिमंता बिस्वा सरमा ने एक बयान में कहा था कि चार से पांच लाख “मियाँ” मतदाताओं को चुनाव सूची से हटाया जाएगा और उनकी पार्टी सीधे तौर पर “मियाँ” के खिलाफ है।

मौलाना महमूद मदनी की ओर से दायर याचिका में जोर देकर कहा गया है कि मुख्यमंत्री का यह भाषण, इस संदर्भ में कि वह एक उच्च संवैधानिक पद पर हैं, किसी भी तरह से सिर्फ राय व्यक्त करने के दायरे में नहीं आता।

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