मक्का पर यमन के हमले का ढिंढोरा पीटने वाला सऊदी, अल अक़्सा के अपमान पर चुप क्यों है?

मक्का पर यमन के हमले का ढिंढोरा पीटने वाला सऊदी, अल अक़्सा के अपमान पर चुप क्यों है?

ग़ाज़ा में इस्राईल द्वारा आम नागरिकों का जनरसंहार लगातार जारी है। इन सबके बीच अल अक़्सा मस्जिद में इस्राईल के कट्टर पंथी नेता और यहूदी अल अक़्सा में दाखिल होकर लगातार अल अक़्सा की पवित्रता का अपमान करते हैं। न सिर्फ़ अपमान करते हैं बल्कि, उलटे सीधे सीधे बयान भी देते रहते हैं। इनमे इस्राईल के आंतरिक सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्वीर और इस्राईली वित्तमंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच का नाम प्रमुख है। अल अक़्सा की पवित्रता के अपमान पर 57 इस्लामिक देशों के शासक मूक दर्शक बने हुए हैं। इस्राईली कट्टर पंथी नेताओं को यह हौसला, सबसे ज़्यादा सऊदी, दुबई, बहरीन, तुर्की  और कुवैत समेत उन अरब शासकों की ख़ामोशी से मिलता है जो अपने आपको इस्लामिक देशों का ठेकेदार समझते हैं।

ऐसे समय में जब सऊदी अरब और यमन के बीच तनाव चरम पर है, सऊदी अरब ने यमन के हूती समूह पर मक्का जैसे पवित्र शहर पर ड्रोन हमले का आरोप लगाया। हालांकि उसने इस हमले का कोई प्रमाण पेश नहीं किया। इस आरोप का मक़सद साफ़ था। सऊदी अरब  यमन के ख़िलाफ़ इस्लामिक देशों और इस्लामिक उम्मत को भड़काना चाहता था, लेकिन यमन के होती समूह ने इस साज़िश को  हुए नाकाम बना दिया कि, मक्का पर हमने कोई हमला नहीं किया है। सऊदी इस हमले से यमन को बदनाम करना चाहता है। इतना ही नहीं, हूतियों ने यह भी एलान कर दिया कि, वह भविष्य में भी मक्का और मदीना जैसे पवित्र शहर पर कभी भी हमला नहीं करेंगे।

प्रश्न यह उठता है कि, मक्का पर हमले का ढिंढोरा पीटने वाला सऊदी, अल अक़्सा के अपमान पर चुप क्यों है?

क्या अल अक़्सा इस्लामिक देशों के लिए पवित्र स्थल नहीं है ?

क्या बेन ग्वीर और स्मोट्रिच द्वारा अल अक़्सा के अपमान पर अरब शासकों का ख़ून क्यों नहीं खौलता?

अल अक़्सा के अपमान पर अरब शासक मूक दर्शक क्यों बने रहते हैं?

क्या अरब शासकों ने इस्राईल को अल अक़्सा के अपमान के ठेका दे दिया है?

क्या मक्का पर हमले का सऊदी दावा केवल हूतियों को बदनाम के लिए था?

जब फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों और अल–अक़्सा की पवित्रता का मामला सामने आता है, तो इस्लामी दुनिया के शक्तिशाली शासकों की आवाज़ उतनी बुलंद क्यों नहीं होती, जितनी दूसरे मामलों में सुनाई देती है?

मक्का की पवित्रता पर शोर, अल-अक़्सा के अपमान पर ख़ामोशी!

ग़ाज़ा की धरती आज भी तबाही, बर्बादी और इंसानी त्रासदी की गवाह बनी हुई है। फ़िलिस्तीनी नागरिकों की मौतें, बेघर होते परिवार, मलबे में तब्दील होते घर और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती आबादी पूरी दुनिया के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर रही है। ऐसे हालात में अल-अक़्सा मस्जिद को लेकर भी तनाव लगातार बढ़ता रहा है। इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों में शामिल अल-अक़्सा परिसर में इस्राईली दक्षिणपंथी नेताओं की गतिविधियाँ, उनके उकसाने वाले बयान और पवित्र स्थल की मौजूदा व्यवस्था को बदलने की कोशिशें मुस्लिम दुनिया के लिए गहरी चिंता का विषय हैं।

विशेष रूप से सऊदी अरब से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या इस्लामी पवित्र स्थलों की अहमियत केवल उनकी भौगोलिक सीमाओं तक सिमटकर रह गई है? क्या मक्का और मदीना के मामले में भावनाएँ जाग उठती हैं, लेकिन बैतुल मुक़द्दस और अल-अक़्सा के मामले में वही भावनाएँ कूटनीतिक हिसाब-किताब के नीचे दब जाती हैं?

अल-अक़्सा का अपमान और मुस्लिम दुनिया की परीक्षा

मस्जिद अल-अक़्सा केवल फ़िलिस्तीन की एक मस्जिद नहीं है। यह दुनिया भर के मुसलमानों की धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और सामूहिक पहचान का अहम हिस्सा है। यरूशलम का यह पवित्र परिसर दशकों से राजनीतिक संघर्ष, सैन्य नियंत्रण और धार्मिक तनाव के केंद्र में रहा है।

इस्राईल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन-ग्वीर जैसे दक्षिणपंथी नेता अल-अक़्सा परिसर में कई बार प्रवेश कर चुके हैं। उनके ऐसे क़दमों और सार्वजनिक बयानों को फ़िलिस्तीनियों तथा अनेक मुस्लिम देशों ने उकसावे की कार्रवाई माना है। इसी तरह वित्तमंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच की फ़िलिस्तीनियों के बारे में कठोर राजनीतिक बयानबाज़ी ने भी क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाया है। अल-अक़्सा की मौजूदा धार्मिक व्यवस्था और उसके ऐतिहासिक स्वरूप को बदलने की किसी भी कोशिश के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यही कारण है कि इस परिसर से जुड़ी घटनाओं पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

ऐसे समय में सऊदी अरब, संयुक्त अरब, अमीरात, बहरीन, तुर्की और अन्य प्रभावशाली मुस्लिम देशों की नीतियों का मूल्यांकन केवल उनके बयानों से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक क़दमों से किया जाना चाहिए। फ़िलिस्तीन के समर्थन में बयान देना एक बात है और उस समर्थन को ठोस राजनीतिक दबाव में बदलना दूसरी बात। अगर शक्तिशाली देश केवल निंदा जारी करें, लेकिन अपनी कूटनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक ताक़त का प्रभावी इस्तेमाल न करें, तो उनके समर्थन की वास्तविक सीमा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सऊदी अरब: हर मुद्दे पर धार्मिक भावनाएँ, लेकिन अल-अक़्सा पर सीमित दबाव क्यों?

सऊदी अरब को इस्लामी दुनिया में एक विशेष धार्मिक और राजनीतिक स्थान हासिल है। मक्का और मदीना की वजह से दुनिया भर के मुसलमान उसकी नीतियों पर नज़र रखते हैं। सऊदी नेतृत्व जब किसी घटना को पवित्र स्थलों की सुरक्षा से जोड़ता है, तो उसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक मुस्लिम जनमत को भी प्रभावित करता है। इसीलिए सऊदी अरब से अपेक्षा की जाती है कि वह अल-अक़्सा के मामले में भी उतनी ही गंभीरता दिखाए।

अगर मक्का पर हमले का आरोप सामने आता है, तो उसकी जाँच, प्रमाण और आधिकारिक स्पष्टीकरण आवश्यक हैं। लेकिन अगर अल-अक़्सा परिसर में उकसावे की घटनाएँ होती हैं, तो उन पर भी स्पष्ट और प्रभावी प्रतिक्रिया होनी चाहिए। धार्मिक पवित्रता के सवाल पर एक ही कसौटी लागू होनी चाहिए। सऊदी अरब फ़िलिस्तीन के समर्थन में बयान देता रहा है और उसने स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना को अपनी घोषित नीति का हिस्सा बनाया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उसने हर अवसर पर पूरी तरह ख़ामोशी ही बरती है। असली सवाल यह है कि क्या उसके बयान और कूटनीतिक प्रयास ज़मीनी हालात बदलने के लिए पर्याप्त हैं?

क्या वह इस्राईल पर वास्तविक दबाव बनाने के लिए अपने क्षेत्रीय प्रभाव का इस्तेमाल कर रहा है? क्या फ़िलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा और अल-अक़्सा की स्थिति को अपनी विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में पर्याप्त स्थान दे रहा है?

इन सवालों का जवाब केवल सरकारी बयानों से नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों और उनके परिणामों से मिलना चाहिए।

मक्का पर हमले का आरोप: प्रमाण कहाँ हैं?

सऊदी अरब और यमन के हूती आंदोलन के बीच संघर्ष लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का हिस्सा रहा है। इस संघर्ष में मिसाइल हमलों, ड्रोन हमलों और सीमा पार सैन्य कार्रवाइयों के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। लेकिन मक्का जैसे पवित्र शहर पर किसी हमले का आरोप साधारण सैन्य आरोप नहीं है। ऐसा दावा धार्मिक भावनाओं और व्यापक मुस्लिम जनमत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए यदि सऊदी अरब किसी विशेष घटना के लिए हूतियों को ज़िम्मेदार ठहराता है, तो उसे उपलब्ध प्रमाण, घटना का समय, इस्तेमाल किए गए हथियार और जाँच के निष्कर्ष सार्वजनिक करने चाहिए।

यहाँ एक बुनियादी सिद्धांत लागू होना चाहिए: किसी भी पक्ष के दावे को केवल इसलिए सच नहीं मान लेना चाहिए कि वह धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। मक्का की पवित्रता का सवाल अत्यंत संवेदनशील है। यदि किसी हमले का वास्तविक प्रमाण मौजूद है, तो उसकी गंभीरता से जाँच होनी चाहिए। और यदि आरोप प्रमाणित नहीं हैं, तो उन्हें राजनीतिक प्रचार के रूप में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। बिना स्वतंत्र पुष्टि के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सऊदी अरब ने जानबूझकर हूतियों को बदनाम करने के लिए ऐसा आरोप लगाया। लेकिन यह सवाल अवश्य उठता है कि क्या ऐसे संवेदनशील दावों को सार्वजनिक करने के साथ पर्याप्त प्रमाण भी प्रस्तुत किए जाते हैं।

धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाने से बचना सभी पक्षों की ज़िम्मेदारी है।

अगर मक्का पवित्र है, तो अल-अक़्सा क्यों नहीं?

यह इस बहस का सबसे बुनियादी सवाल है।

मक्का मुसलमानों का क़िबला और हज का केंद्र है। मदीना भी इस्लाम की महान धार्मिक विरासत का प्रतीक है। वहीं अल-अक़्सा मस्जिद इस्लामी इतिहास और आस्था में विशेष स्थान रखती है। इन पवित्र स्थलों की अलग-अलग धार्मिक हैसियत होने के बावजूद, किसी भी स्थल की पवित्रता का सम्मान दूसरे स्थल की उपेक्षा का बहाना नहीं बन सकता। अगर मक्का की सुरक्षा पर मुस्लिम दुनिया को एकजुट होना चाहिए, तो अल-अक़्सा की पवित्रता और वहाँ इबादत करने वालों के अधिकारों पर भी एकजुटता आवश्यक है।

सवाल यह नहीं कि मक्का अधिक महत्वपूर्ण है या अल-अक़्सा। सवाल यह है कि क्या धार्मिक आस्था का इस्तेमाल चुनिंदा राजनीतिक परिस्थितियों में ही किया जाएगा?

जब किसी मुद्दे पर व्यापक जनभावनाएँ भड़कती हैं, तो अनेक सरकारें तुरंत सक्रिय दिखाई देती हैं। लेकिन जब उसी मुद्दे पर शक्तिशाली सहयोगियों के हित प्रभावित होने की आशंका हो, तो उनकी भाषा सावधान और कार्रवाई सीमित हो जाती है। यही वह दोहरा रवैया है जिसकी आलोचना की जानी चाहिए। इस्लामी देशों के शासकों को यह स्पष्ट करना होगा कि धार्मिक पवित्रता किसी राजनीतिक गठबंधन, आर्थिक लाभ या रणनीतिक साझेदारी से छोटी नहीं हो सकती।

अरब देशों के रिश्ते और फ़िलिस्तीन का भविष्य

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे देशों के इस्राईल के साथ संबंधों का सवाल फ़िलिस्तीन की राजनीति में विशेष महत्व रखता है। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने 2020 में अब्राहम समझौतों के तहत इस्राईल के साथ संबंध सामान्य किए। सऊदी अरब ने भी क्षेत्रीय कूटनीति में अलग-अलग समय पर संवाद और संभावित सामान्यीकरण की शर्तों पर चर्चा की है, हालाँकि उसके और इस्राईल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं हुए हैं।

इन संबंधों के समर्थक कहते हैं कि संवाद से क्षेत्रीय स्थिरता और राजनीतिक समाधान के रास्ते खुल सकते हैं। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि अगर कूटनीतिक रिश्तों के बावजूद फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों, ग़ाज़ा में नागरिकों की सुरक्षा और अल-अक़्सा की स्थिति में ठोस सुधार नहीं होता, तो इन संबंधों का लाभ किसे मिल रहा है?

यदि राजनयिक संबंधों का इस्तेमाल दबाव बनाने के बजाय केवल सामान्य राजनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने में हो, तो उसकी आलोचना जायज़ है। अरब देशों को यह साबित करना होगा कि उनकी कूटनीति फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों को हाशिये पर डालने का माध्यम नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाधान का साधन है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए IscPress उत्तरदायी नहीं है।

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