हम सऊदी अरब के साथ हैं, लेकिन हूतियों के ख़िलाफ़ सैनिक नहीं भेजेंगे: सीरिया
एक्सियोस की उस रिपोर्ट के बाद, जिसमें सऊदी अरब और दमिश्क़ के बीच यमन में हज़ारों सीरियाई सैनिकों को भेजने की योजना का ख़ुलासा किया गया था, अबू मोहम्मद अल-जूलानी के मीडिया सलाहकार ने इस दावे को ख़ारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि सीरिया सऊदी अरब के साथ खड़ा है, लेकिन यमन में सीरियाई सैनिकों को भेजे जाने की ख़बर सही नहीं है।
दमिश्क़ में सत्तारूढ़ विद्रोही नेतृत्व के प्रमुख अबू मोहम्मद अल-जूलानी के मीडिया सलाहकार अहमद मुवफ़क़ ज़ैदान ने सऊदी अरब के समर्थन में सीरियाई सैनिकों को यमन भेजे जाने की खबरों का आधिकारिक तौर पर खंडन किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा, “कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा किए गए ये दावे कि सऊदी अरब के साम्राज्य ने सीरियाई सैनिकों को सऊदी अरब या यमन भेजने का अनुरोध किया है, झूठे और निराधार हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “सऊदी अरब के साम्राज्य और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा सीरिया की सुरक्षा से अलग नहीं है। दमिश्क़ में हम पवित्र हरमैन की धरती (सऊदी अरब) पर रहने वाले अपने भाइयों के साथ मज़बूती और दृढ़ता से खड़े हैं। हालांकि, कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा किए गए ये दावे कि सऊदी अरब के साम्राज्य ने सीरियाई सैनिकों को सऊदी अरब या यमन भेजने का अनुरोध किया है, ग़लत और निराधार हैं।
इससे पहले, समाचार वेबसाइट ‘एक्सियोस’ ने रिपोर्ट दी थी कि, सऊदी अरब और सीरिया यमन में अंसारुल्लाह के ख़िलाफ़ आक्रामक सैन्य अभियान को मज़बूत करने के लिए सीरियाई सैनिकों को भेजने की संभावना पर बातचीत कर रहे हैं।
वेबसाइट के अनुसार, अबू मोहम्मद अल-जूलानी सऊदी अरब के इस अनुरोध पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। हालांकि, एक्सियोस से बातचीत करने वाले एक सूत्र ने कहा कि इस योजना को मंज़ूरी मिलने की संभावना काफी अधिक है। एक्सियोस ने यह भी लिखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस प्रस्ताव का विरोध नहीं कर रहा है। अमेरिकी प्रशासन इसे सऊदी अरब के समर्थन वाले सैन्य अभियान को मज़बूत करने का ऐसा तरीक़ा मानता है, जिससे अमेरिका की प्रत्यक्ष भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि किए बिना अभियान को आगे बढ़ाया जा सके।
इसी सिलसिले में, संभावित रूप से सीरियाई सैनिकों को भेजने के तौर-तरीकों पर अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) के साथ भी विचार-विमर्श किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संभावित तैनाती में 10,000 से 20,000 सीरियाई सैनिक शामिल हो सकते हैं। इन सैनिकों को संभवतः दमिशक़ के पास तैनात ‘90वें डिवीजन’ और दक्षिणी सीरिया में मौजूद ‘84वें डिवीज़न’ से लिया जा सकता है।
इन सैन्य इकाइयों में हज़ारों विदेशी लड़ाके शामिल हैं, जो पहले असद शासन के खिलाफ युद्ध के दौरान ‘हयात तहरीर अल-शाम’ के झंडे तले लड़ते थे। दूसरी ओर, लेबनान के अखबार ‘अल-अख़बार’ ने भी एक दिन पहले सना में मौजूद ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी थी कि अंसारुल्लाह को ऐसी जानकारी मिली है, जिससे पुष्टि होती है कि रियाद ने अंकारा की मदद से सैकड़ों सीरियाई चरमपंथियों को अपने क्षेत्र के रास्ते यमन पहुंचाया है।
गौर करने वाली बात यह है कि क्षेत्र में जारी युद्धों या दूर-दराज के संघर्षों में सीरियाई भाड़े के लड़ाकों का इस्तेमाल कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है। इससे पहले भी लीबिया और नाइजर सहित विभिन्न युद्धक्षेत्रों में उनका इस्तेमाल किया जा चुका है। इसके अलावा, सीरिया के विदेशी लड़ाके रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में यूक्रेनी सेना की ओर से भी शामिल रहे हैं।
वहीं, ‘तुर्किये टुडे’ पत्रिका ने सीरियाई सूत्रों के हवाले से दावा किया कि दमिशक़ ने यमन की अग्रिम मोर्चों पर सीरियाई लड़ाकों की एक टुकड़ी तैयार करने और उसे भेजने के सऊदी अरब के पहले के अनुरोध को ठुकरा दिया था। इस अनुरोध को अस्वीकार करने के पीछे जो कारण बताया गया, वह यह था कि सीरिया को अपनी सेना के पुनर्निर्माण की आवश्यकता है और वह युद्ध में सीधे तौर पर शामिल होने से बचना चाहता है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब कुछ समय पहले ही अल-जूलानी अचानक सऊदी अरब के विमान से रियाद पहुंचे थे और वहां उन्होंने सऊदी युवराज से मुलाक़ात की थी। यमन में युद्ध तेज़ होने के साथ ही इस मुलाकात ने यह सवाल खड़ा कर दिया था कि क्या सीरिया भी यमन युद्ध में खिंच सकता है?
हालांकि, सीरियाई और सऊदी मीडिया ने इस यात्रा के आर्थिक उद्देश्यों पर जोर दिया और पहले से घोषित न की गई इस मुलाकात के सटीक विवरणों का उल्लेख करने से परहेज किया।


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