हम कूटनीति के पक्षधर, लेकिन युद्ध के लिए भी तैयार हैं: ईरानी विदेश मंत्री
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराक़ची ने इस्लामी क्रांति की वर्षगांठ के अवसर को याद करते हुए कहा कि इस मौके पर ईरान के महान नेता इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रांति के शहीदों को स्मरण करना उचित है, जिन्होंने ईरानी जनता की इच्छा को सर्वोच्च बनाया। उन्होंने कहा कि क्रांति की वर्षगांठ पर यह सोचना ज़रूरी है कि इस्लामी क्रांति क्यों हुई, उसके आदर्श क्या थे और विदेश नीति में किस तरह व्यवहार किया जाना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि क्रांति के दौरान जनता का मुख्य नारा था: “स्वतंत्रता, आज़ादी और इस्लामी गणराज्य।” आज़ादी की बात स्वाभाविक है, लेकिन लोग स्वतंत्रता पर इतना ज़ोर क्यों दे रहे थे? ईरान अपने इतिहास में कभी औपनिवेशिक देश नहीं रहा, फिर भी लोग स्वतंत्रता क्यों चाहते थे?
इसका कारण यह था कि उस दौर में जनता खुद को स्वतंत्र नहीं मानती थी। क़ाजार काल का इतिहास अपमान और विदेशी हस्तक्षेप की भावना से भरा हुआ था। यहां तक कि शाह, देश का प्रमुख होते हुए भी, देश के भीतर कहीं भी स्वतंत्र रूप से नहीं जा सकता था।
विदेश मंत्री ने पहलवी शासन के सत्ता में आने और उसके तख्तापलट का उल्लेख करते हुए कहा कि 1964 में इमाम ख़ुमैनी का प्रसिद्ध भाषण बहुत कुछ स्पष्ट करता है। उन्होंने कहा था कि आज मेरा दिल उस कानून के कारण दुखी है, जो संसद में पारित किया गया और जिसमें विदेशी सलाहकारों को कानूनी छूट दी गई। इमाम ख़ुमैनी ने कहा था कि, यदि कोई अमेरिकी नौकर आपके शाह को कुचल दे, तो कोई उसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकता, लेकिन यदि आपका बादशाह अमेरिका के किसी कुत्ते को कुचल दे, तो उसे सज़ा दी जाएगी।
अराक़ची ने कहा कि वे यह बताना चाहते हैं कि किसने ईरानी जनता की सच्ची स्वतंत्रता की मांग को साकार किया। इसके पीछे वर्षों का इतिहास है। देश को वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करनी थी और यही हमारे संविधान का केंद्रीय सिद्धांत है।
उन्होंने कहा कि प्रभुत्व को नकारना और स्वतंत्रता की रक्षा करना इस्लामी गणराज्य के मूल सिद्धांत हैं। यदि इसे न समझा जाए तो ईरान की विदेश नीति को समझना कठिन होगा। संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सरकार का कर्तव्य विदेशी प्रभाव और हस्तक्षेप को रोकना है। स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सम्मान के सिद्धांत के बिना ईरान की विदेश नीति को नहीं समझा जा सकता।
ईरान ने शांतिपूर्ण यूरेनियम संवर्धन के अधिकार के लिए भारी कीमत चुकाई है
उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि ईरान ने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन के अधिकार के लिए भारी कीमत चुकाई है। यह ईरान की आवश्यकता थी। स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से देखें तो किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह हमें बताए कि हमें क्या रखना चाहिए और क्या नहीं। संवर्धन करना हमारा अधिकार है और यह हमारा आंतरिक मामला है।
अराक़ची ने कहा कि दुश्मन कहते हैं कि आपको संवर्धन नहीं करना चाहिए क्योंकि हम चिंतित हैं। लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं कि वह हमें कहे कि तुम यह मत रखो क्योंकि मैं चाहता हूँ। ईरान को यह साबित करना होगा कि वह किसी से आदेश नहीं लेता। यदि हमारे परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई सवाल हैं तो हम स्पष्टीकरण देने को तैयार हैं और इसका एकमात्र रास्ता कूटनीति है। हमारे परमाणु प्रतिष्ठानों पर बमबारी भी की गई, लेकिन वे सफल नहीं हुए।
बातचीत तभी सफल होगी जब ईरान के अधिकारों को स्वीकार किया जाए
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन बातचीत तभी सफल होती है जब ईरानी जनता के अधिकारों को स्वीकार किया जाए। उन्होंने कहा कि हमें किसी से अपने अधिकारों की मान्यता नहीं चाहिए। हमारे अधिकार मौजूद हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए।
हम ताक़तवर देशों की ज़बरदस्ती को अस्वीकार करते हैं
अराक़ची ने स्पष्ट किया कि ईरान परमाणु बम के पीछे नहीं है। हमारा परमाणु बम, बड़ी शक्तियों को “ना” कहना है। हम ताक़तवर देशों की ज़बरदस्ती को अस्वीकार करते हैं, यह हमारे संविधान में दर्ज है। हमने यह अधिकार भारी कीमत देकर हासिल किया है और यदि इससे पीछे हटे तो हमें और अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
12-दिवसीय अघोषित युद्ध में ईरानी जनता की अडिगता सिद्ध हो गई
उन्होंने कहा कि 12-दिवसीय युद्ध में ईरानी जनता की अडिगता सिद्ध हो गई। जो लोग तीसरे दिन बिना शर्त आत्मसमर्पण की बात कर रहे थे, वे बारहवें दिन बिना शर्त युद्ध-विराम की बात करने लगे। आज भी क्षेत्र में उनकी सैन्य तैनाती हमें डराती नहीं है। हम कूटनीति के पक्षधर हैं और हमारे पास तर्क है, लेकिन हम युद्ध के लिए भी तैयार हैं और हमारे पास शक्ति भी है।
अगर ज़ोर-ज़बरदस्ती की भाषा में बात की गई तो उसी भाषा में जवाब देंगे
अंत में विदेश मंत्री ने कहा कि यदि ईरानी जनता से ज़ोर-ज़बरदस्ती की भाषा में बात की गई तो उसी भाषा में जवाब दिया जाएगा, और यदि सम्मान की भाषा में बात की गई तो उसी भाषा में उत्तर दिया जाएगा। हमारी विदेश नीति का पहला सिद्धांत सम्मान और गरिमा है, और इसका अर्थ है देश की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा।


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