पाकिस्तान की ईरान और सऊदी अरब से बढ़ती नज़दीकी से यूएई नाराज़: न्यूयॉर्क टाइम्स
न्यूयॉर्क टाइम्स (The New York Times) ने लिखा है कि अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान की कोशिशों तथा ईरान के हमलों की पाकिस्तान द्वारा निंदा न किए जाने के कारण अबू धाबी और इस्लामाबाद के संबंधों में तनाव पैदा हो गया है।
इसी वजह से संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) में काम कर रहे पाकिस्तानी शिया मज़दूरों को निकाला और निर्वासित किया जा रहा है। निकाले गए लोगों का कहना है कि, अमीराती अधिकारियों की धारणा है कि जो भी शिया है, वह ईरान का समर्थक है।
पिछले महीने यूएई ने पाकिस्तान को दिए गए अपने 3.5 अरब डॉलर के कर्ज़ की वापसी की मांग की। इसके जवाब में Saudi Arabia ने पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को मज़बूत करने के लिए 3 अरब डॉलर जमा कराकर उसकी मदद की। रिपोर्ट के अनुसार, यूएई पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ गर्मजोशी भरे संबंधों और ईरान से बढ़ती नज़दीकी से खुश नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम से यूएई की दोहरी नीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक तरफ़ वह खुद को क्षेत्र में स्थिरता, निवेश और सहिष्णुता का केंद्र बताता है, वहीं दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के ईरान और सऊदी अरब से बढ़ते संबंधों से असहज होकर राजनीतिक दबाव की नीति अपनाता दिखाई दे रहा है। अगर केवल कूटनीतिक मतभेदों की वजह से वहां काम कर रहे पाकिस्तानी शिया मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है, तो यह न सिर्फ़ मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि मज़हबी पहचान के आधार पर भेदभाव का खुला उदाहरण भी है।
अमीरात दंडित हुआ हैं, आगे और भी दंडित होगा: मुख़बिर
मोहम्मद। मुख़बिर (Mohammad Mokhber) जो ईरान के सर्वोच्च नेता के सहायक हैं, ने कहा:
“ये देश लंबे समय तक अपने आपको निवेश की सुरक्षा का स्वर्ग बताते रहे, लेकिन आज हालत यह है कि वहां से पूंजी का सबसे बड़ा पलायन हो रहा है। वे इसका नुकसान देख चुके हैं और आगे भी अधिक नुकसान उठाएंगे। इन्हें और भी दंडित किया जाएगा।”
मुख़बिर का बयान बदलते माहौल की ओर इशारा करता है। उनका कहना है कि जो देश कभी खुद को सुरक्षित निवेश का केंद्र बताते थे, आज वहां से पूंजी का पलायन बढ़ रहा है और उनकी नीतियों का नकारात्मक असर सामने आ रहा है। उनका संकेत साफ़ है कि क्षेत्र में अहंकार, दखलअंदाज़ी और दबाव की राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती।
आज ज़रूरत इस बात की है कि यूएई अपने रवैये पर पुनर्विचार करे। पड़ोसी देशों के आपसी संबंधों से असुरक्षित महसूस करने के बजाय उसे क्षेत्रीय शांति, सम्मान और बराबरी की नीति अपनानी चाहिए। मज़दूरों, प्रवासियों और आम लोगों को राजनीतिक मतभेदों की कीमत चुकाने पर मजबूर करना किसी भी देश की छवि को मज़बूत नहीं, बल्कि कमज़ोर करता


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