यमन के सामने सऊदी अरब दो मुश्किल विकल्पों के बीच फँसा: वॉशिंगटन पोस्ट
एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब को यमन के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई बढ़ाने या तनाव कम करने के बीच किसी एक विकल्प को चुनने में कठिनाई हो रही है। अमेरिका के वादों पर भरोसा भी अब कमज़ोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक नई रिपोर्ट में कहा है कि, यमन के हमलों ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को एक कठिन स्थिति में डाल दिया है। उन्हें देश की सुरक्षा से जुड़े बढ़ते ख़तरों और आर्थिक विकास की महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। यह स्थिति ऐसे समय में पैदा हुई है, जब ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका की जंग की कीमत खाड़ी देशों के सामने लगातार स्पष्ट होती जा रही है।
वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा कि सऊदी अरब दशकों से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहा है। लेकिन अब उसे ऐसे युद्ध के परिणामों का सामना करना पड़ रहा है, जिसे उसने खुद शुरू नहीं किया था।रिपोर्ट के अनुसार, यमन की ओर से किए गए हमलों में रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाया गया। इस हमले में 13 लोगों की मौत हुई और 300 से अधिक लोग घायल हुए। इसके बाद हवाई अड्डे को बंद करना पड़ा और सैकड़ों उड़ानें रद्द हो गईं।
यमन के हमलों से सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को ख़तरा
अमेरिकी अख़बार ने ज़ोर देकर कहा कि, इन हमलों से पर्यटन, विमानन और व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी नुकसान पहुँचा है। इससे सऊदी अरब की महत्वाकांक्षी आर्थिक योजना ‘विजन 2030’ पर भी ख़तरा पैदा हो गया है। विजन 2030 सऊदी अरब की वह योजना है, जिसके तहत देश अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालकर पर्यटन, व्यापार और दूसरे क्षेत्रों को बढ़ावा देना चाहता है।
ऐसे में मोहम्मद बिन सलमान पर यमन के ख़िलाफ़ सैन्य जवाबी कार्रवाई करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। लेकिन वह यह भी समझते हैं कि यमन में लंबे समय तक युद्ध जारी रहने से सऊदी अरब के संसाधन खत्म हो सकते हैं और अर्थव्यवस्था को विविध बनाने की योजनाओं को बड़ा झटका लग सकता है।
अमेरिका नए युद्ध में शामिल होने से बच रहा
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि मौजूदा परिस्थितियों में अमेरिका भी एक और बड़े सैन्य संघर्ष में शामिल होने का इच्छुक नहीं दिखाई देता। खासकर, मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिका किसी नए बड़े युद्ध में उलझने से बचना चाहता है।
इसी संदर्भ में रिपोर्ट का दावा है कि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब की मदद करने की अपील को दो बार ठुकरा दिया। इससे खाड़ी देशों की सुरक्षा के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता और उसके वादों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।
सऊदी अरब के सामने दो मुश्किल विकल्प
वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि सऊदी अरब इस समय दो कठिन विकल्पों के बीच फँसा हुआ है।
पहला विकल्प: सैन्य कार्रवाई बढ़ाना।
अगर सऊदी अरब यमन के ख़िलाफ़ अपने सैन्य हमले तेज करता है, तो उसे एक लंबे और ऐसे युद्ध में उलझना पड़ सकता है, जिसका अंत जल्दी होता दिखाई नहीं देता। इससे सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और उसके विकास से जुड़ी योजनाओं को नुकसान पहुँच सकता है।
दूसरा विकल्प: तनाव कम करना।
अगर सऊदी अरब सैन्य कार्रवाई से पीछे हटता है और तनाव कम करने की कोशिश करता है, तो इसे उसकी कमज़ोरी के रूप में देखा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी स्थिति में यमन की ओर से भविष्य में और हमले किए जाने की आशंका भी सऊदी अरब की चिंता बढ़ा सकती है।
खाड़ी देशों का अमेरिका पर भरोसा कमज़ोर होने की आशंका
रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि इस संकट से क्षेत्रीय गठबंधनों का स्वरूप बदल सकता है। साथ ही, खाड़ी देशों का अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा भी कमज़ोर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर: रिपोर्ट का मुख्य संदेश यह है कि, सऊदी अरब के लिए यमन के ख़िलाफ़ युद्ध तेज़ करना भी जोखिम भरा है और तनाव कम करना भी आसान नहीं है। एक तरफ देश की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ उसकी अर्थव्यवस्था और भविष्य की विकास योजनाएँ हैं। वहीं, अमेरिका से अपेक्षित मदद न मिलने की स्थिति ने सऊदी अरब की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।


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