अमेरिका के वर्चस्व से मुक्ति, यमनी क्रांति का परिणाम: अब्दुल मलिक अल-हूती
अंसारुल्लाह आंदोलन के नेता अब्दुल मलिक बद्रुद्दीन अल-हूती ने 21 सितंबर की यमनी क्रांति को स्वतंत्रता, आज़ादी और अमेरिकी वर्चस्व से मुक्ति का कारण बताते हुए कहा कि आज़ादी और स्वतंत्रता की नेमत तथा विदेशी संरक्षण के गलत रास्ते को रोकना एक बहुत बड़ी नेमत है।
उन्होंने कहा कि यमन की क्रांति से पहले जो कुछ हुआ, वह यमनी जनता की आज़ादी और स्वतंत्रता को छीनकर देश को विदेशी संरक्षण के अधीन करने की कोशिश थी। उन्होंने कहा, “अगर यह क्रांति नहीं हुई होती तो हमारी जनता अपनी आज़ादी और स्वतंत्रता खो देती और पूरी तरह दुश्मनों के सामने समर्पण कर देती।”
अंसारुल्लाह नेता ने आगे कहा कि हैरानी की बात यह है कि यमन की क्रांति से पहले कुछ समूह विदेशी संरक्षण के सामने समर्पण कर चुके थे और उसे स्वीकार कर लिया था। वे विदेशी पक्षों के साथ इस तरह व्यवहार करते थे, जैसे वे कोई परोपकारी संस्थाएँ हों।
अल-हूती ने जोर देकर कहा कि क्रांति से पहले यमन में निर्णय लेने का अधिकार विदेशी पक्षों को सौंप दिया गया था। उन्होंने कहा कि सना की सरकार केवल एक दिखावटी सरकार थी, जो सिर्फ उनके आदेशों को लागू करती थी। विदेशी निर्भरता देश को विघटन, विभाजन, फूट और स्थिति को संकटपूर्ण बनाने की ओर ले जा रही थी।
क्रांति से पहले अमेरिकी राजदूत यमन के लिए फैसले करता था: अल-हूती
अंसारुल्लाह नेता ने कहा कि क्रांति से पहले अमेरिकी राजदूत यमन के लिए फैसले करता था। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने सना में एक सैन्य अड्डा भी स्थापित कर रखा था। उन्होंने कहा कि क्रांति के बाद भी दुश्मनों ने यमनी जनता के खिलाफ साजिशें जारी रखीं।
उन्होंने कहा, “जब तक अमेरिका का लक्ष्य यमन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना और अपने सैन्य अड्डों को बनाए रखना है, तब तक हमारा इस देश के साथ संघर्ष रहेगा।”
अल-हूती ने कहा कि सऊदी अरब ने अमेरिका की भागीदारी के साथ युद्ध के पहले ही दिन से यमन में सबसे भयानक अपराध किए। उन्होंने कहा कि सऊदी शासन द्वारा यमन में किए गए अपराधों पर युद्ध अपराधों से संबंधित सभी परिभाषाएँ लागू होती हैं।
अंसारुल्लाह नेता ने यमन पर सऊदी अरब के हमले के संबंध में कई अरब और इस्लामी देशों के रुख को निष्क्रिय बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने यमन में किए जा रहे अपराधों के लिए आवश्यक राजनीतिक संरक्षण उपलब्ध कराया और सऊदी अरब को यमनी जनता की हत्या के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों के समझौते उपलब्ध कराए।
उन्होंने कहा कि यमन में तनाव बढ़ने के वर्षों के दौरान सऊदी अरब ने अपना “इस्राईली चेहरा” उजागर कर दिया। उन्होंने कहा, “सऊदी अरब ने अपना क्रूर चेहरा उजागर किया और हजारों बच्चों, महिलाओं और आम नागरिकों की हत्या की। सऊदी अरब ने 2,000 से अधिक मस्जिदों को भी निशाना बनाया। हमारे पास इन अपराधों से संबंधित दस्तावेज़ और तस्वीरें मौजूद हैं।”
यमन को लेकर दूसरे देशों की दोहरी नीतियों पर अंसारुल्लाह नेता की कड़ी आलोचना
अल-हूती ने सऊदी अरब द्वारा यमन की नाकाबंदी की आलोचना करते हुए उन लोगों को संबोधित किया, जो सऊदी हमलों के जवाब में सना की कार्रवाई की आलोचना करते हैं।
उन्होंने सवाल किया, “क्या वे पक्ष, जो सऊदी अरब की तेल प्रतिष्ठानों के लिए चिंता व्यक्त करते हैं और हमारी सेनाओं के हमलों के जवाब में रोना-धोना मचाते हैं, हमारे आयातित सामानों पर लगाए गए प्रतिबंधों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? क्या वे उन कदमों को स्वीकार करेंगे, जिनसे हमारे व्यापारिक आवागमन को सीमित किया जाता है और हमारी राष्ट्रीय मुद्रा को नुकसान पहुँचता है? क्या वे अपने तेल और गैस के संसाधनों से वंचित होना स्वीकार करेंगे?”
उन्होंने आगे कहा, “क्या तुर्की और पाकिस्तान की जनता यह स्वीकार करेगी कि सऊदी अरब उनकी तमाम नीतियों में हस्तक्षेप करे? क्या वो फ़ारस की खाड़ी के देश अपने लिए ऐसी स्थिति पसंद करेंगे? सऊदी अरब चाहता है कि हमारे देश में अधिकारियों को नियुक्त करने वाला एकमात्र पक्ष वही हो।”


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