ईरान-अमेरिका समझौते से इज़रायल बेचैन
इज़रायली समाचार पत्र येदिओत अहरोनोत ने रिपोर्ट दी है कि इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू आज रविवार शाम राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों की मंत्रिस्तरीय परिषद (सुरक्षा कैबिनेट) की बैठक बुलाएंगे। इस बैठक में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते के बाद क्षेत्रीय परिस्थितियों की समीक्षा की जाएगी।
हकीकत या मीडिया का खेल?
इस समाचारपत्र ने एक वरिष्ठ इज़रायली अधिकारी के हवाले से दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला संभावित समझौता “इज़रायल के हितों के विरुद्ध और एक अवांछनीय समझौता” है।
अधिकारी ने यह भी दावा किया कि अब तेल अवीव (इज़रायल) वार्ता की प्रक्रिया को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है और उसकी राय को भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।
हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के दावे अधिकतर मनोवैज्ञानिक और मीडिया-प्रचार का हिस्सा हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी अधिकारियों के अपने बयानों के अनुसार, ईरान से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय इज़रायल की चिंताओं और मांगों को ध्यान में रखा जाता है।
इज़राइली रक्षा मंत्री: हम कहीं से पीछे नहीं हटेंगे: इज़रायली रक्षामंत्री
इस बीच इज़रायल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने कल रात ईरान-अमेरिका के संभावित समझौते पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“इज़रायल को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की अपनी क्षमता सुनिश्चित करनी होगी, ताकि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सके।”
उन्होंने संकेत दिया कि इज़रायल अपनी सुरक्षा नीतियों और सैन्य विकल्पों से पीछे हटने का इरादा नहीं रखता, चाहे क्षेत्रीय कूटनीतिक परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की खबरों ने इज़रायली नेतृत्व में स्पष्ट बेचैनी पैदा कर दी है। इज़रायली मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने सुरक्षा कैबिनेट की बैठक बुलाई है, जिसमें इस संभावित समझौते के क्षेत्रीय प्रभावों पर चर्चा की जाएगी।
कई विश्लेषकों का मानना है कि इज़रायल लंबे समय से ईरान के साथ किसी भी प्रकार के कूटनीतिक समाधान का विरोध करता रहा है, क्योंकि क्षेत्र में तनाव और टकराव की राजनीति उसके रणनीतिक हितों के अनुरूप मानी जाती है। इसी कारण ईरान और अमेरिका के बीच किसी समझौते की संभावना को तेल अवीव अपने लिए एक चुनौती के रूप में देख रहा है।
ईरान का पक्ष यह रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए संचालित करता है और उसने बार-बार कहा है कि वह परमाणु हथियार बनाने का इच्छुक नहीं है। तेहरान का दावा है कि उसकी विदेश नीति का आधार क्षेत्रीय सहयोग और राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान है।
ईरान समर्थक विश्लेषकों का तर्क है कि मध्य पूर्व में अस्थिरता और संघर्षों के पीछे मुख्य कारण इज़रायल की नीतियां रही हैं, न कि ईरान। उनके अनुसार क्षेत्र में अनेक सैन्य कार्रवाइयों, कब्जे और टकरावों ने शांति प्रक्रिया को कमजोर किया है। इसी दृष्टिकोण से देखा जाए तो ईरान को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो स्वयं को क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिरोध की शक्ति मानता है, जबकि इज़रायल को तनाव बढ़ाने वाला पक्ष माना जाता है।
इज़रायल के रक्षा मंत्री Israel Katz द्वारा यह कहना कि इज़रायल ईरान के खिलाफ स्वतंत्र कार्रवाई करने की क्षमता बनाए रखेगा, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि तेल अवीव कूटनीतिक समाधान के बावजूद सैन्य विकल्पों को खुला रखना चाहता है।


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