क्या सऊदी, मुस्लिम देशों की सहानुभूति हासिल करने के लिए हूतियों पर मक्का हमले का झूठा आरोप लगा रहा है???

क्या सऊदी, मुस्लिम देशों की सहानुभूति हासिल करने के लिए हूतियों पर मक्का हमले का झूठा आरोप लगा रहा है???

सऊदी अरब और यमन के बीच बढ़ता तनाव अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सैन्य संघर्ष के साथ-साथ सूचना और प्रचार का युद्ध भी तेज़ होता दिखाई दे रहा है। इसी माहौल में मक्का की ओर ड्रोन आने का सऊदी दावा सामने आया है। सऊदी पक्ष इसे अंसारुल्लाह से जोड़ रहा है, जबकि अंसारुल्लाह ने मक्का या किसी पवित्र धार्मिक स्थल को निशाना बनाने से साफ़ इनकार किया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मक्का के नाम का इस्तेमाल यमन के खिलाफ़ जनमत तैयार करने के लिए किया जा रहा है?

सऊदी और यमन के बीच तनाव चरम सीमा पर है। सऊदी अरब द्वारा यमन पर वहशियाना बमबारी के बाद हूतियों ने सऊदी पर ज़बरदस्त पलटवार किया। सऊदी अरब ने हूतियों पर हमले के लिए अमेरिका से दो बार मदद मांगी, लेकिन ईरान युद्ध में मुंह की खाने के बाद ट्रंप प्रशासन ने यमन में खुलकर हूतियों के सामने आने से साफ़ मना कर दिया। अमेरिका से नकारात्मक जवाब मिलने के बाद सऊदी ने इस्राईल और ब्रिटेन से मदद मांगी है।

यमन का आरोप है कि, सऊदी अरब ने हूतियों का तख़्ता पलट करने के लिए सीरिया के आईएसआईएस आतंकियों को अपनी ज़मीन से यमन भेजा था, लेकिन उसका यह मंसूबा नाकाम हो गया। अल-मोख़ा बंदरगाह पर अंसारुल्लाह के पूर्ण नियंत्रण और सऊदी समर्थित लड़ाकों द्वारा हूतियों के सामने घुटना टेक देने के बाद सऊदी प्रशासन बौखलाया हुआ है। हूतियों की बढ़ती ताक़त से घबराकर सऊदी ने अमेरिका से मदद मांगी लेकिन  ईरान युद्ध में फंसा ट्रंप प्रशासन, यमन में कोई भी जोखिम नहीं लेने के तैयार नहीं हुआ। अमेरिका के बाद सऊदी ने इस्राईल से मदद मांगी। उसी इस्राईल से जिसने ग़ाज़ा में नरसंहार किया और 70 हज़ार ज़्यादा बेगुनाह, औरतों, बच्चों, बुज़ुर्गों और नवजवानों को शहीद कर दिया।  ग़ाज़ा में इस्राईल का अत्याचार अभी तक जारी है।

हूतियों से भयभीत सऊदी अरब ने उस पर सऊदी अरब के सबसे पवित्र स्थल “मक्का” पर हमला करने का आरोप लगाया है। मीडिया में यह ख़बर बहुत ज़ोर-शोर से प्रसारित की जा रही है जबकि, अंसारुल्लाह ने “मक्का”  पर किसी भी प्रकार के हमले से साफ़ इनकार किया है। अंसारुल्लाह का कहना है कि, सऊदी का यह आरोप बहुत पुराना है। विश्लेषकों के अनुसार, सऊदी शासन मक्का पर हमले का झूठा प्रचार कर रहा है, ताकि उसे मुस्लिम देशों की सहानुभूति मिल सके और ग़ाज़ा नरसंहार पर उसकी ख़ामोशी तथा इस्राईल से उसके लगातार मज़बूत होते रिश्तों को लेकर मुसलमानों में जो नाराज़गी है, उससे भी ध्यान भटकाया जा सके।

कुछ विश्लेषकों का यह भी अनुमान है कि यह हमला इस्राईल या फिर सऊदी हुकूमत ख़ुद भी करवा सकती है, ताकि ग़ाज़ा और लेबनान के समर्थन में हूतियों ने इस्राईल पर हमला करके जो लोकप्रियता हासिल की है, उसे भी ख़त्म किया जा सके। सऊदी अरब ने अभी तक ऐसा कोई भी प्रमाण पेश नहीं किया है जिससे यह साबित हो सके कि, मक्का पर हूतियों ने कोई हमला किया है। बता दें कि, यह वही सऊदी हैं जिसने इराक़ में अरबईन के पैदल मार्च के मौक़े पर इमाम हुसैन की ज़ियारत पर जा रहे ज़ाएरीन के कैंप पर हमला किया था।  अब वही सऊदी हूतियों पर मक्का पर हमला करने का आरोप लगा रहा है।

यमन के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई को भी मक्का की सुरक्षा के नाम पर स्वतः उचित नहीं ठहराया जा सकता। मक्का की पवित्रता और यमन का राजनीतिक संघर्ष दो अलग-अलग प्रश्न हैं। दोनों को एक-दूसरे में मिलाकर पेश करने से वास्तविक घटनाओं को समझना और कठिन हो जाता है। अंततः सवाल यही है कि, क्या मक्का की घटना को निष्पक्ष जांच के आधार पर समझा जाएगा या फिर इसे यमन के खिलाफ़ राजनीतिक और सैन्य समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इसका फैसला प्रचार नहीं, बल्कि विश्वसनीय प्रमाण और स्वतंत्र जांच से होना चाहिए।

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