अमेरिकी दबाव के सामने ईरान का दृढ़ रुख़, न झुकेंगे न डरेंगे

अमेरिकी दबाव के सामने ईरान का दृढ़ रुख़, न झुकेंगे न डरेंगे

पश्चिम एशिया की राजनीति इन दिनों दुनिया भर के लिए एक ज़मीनी परीक्षा बन चुकी है. अमेरिका ने ईरान पर सालों से “अधिकतम दबाव” की नीति अपनाई है, लेकिन उसके हालिया प्रस्ताव और धमकियाँ, जिन्हें वह बातचीत कह रहा है, दरअसल ईरान की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और सुरक्षा की बुनियादी चुनौतियों को नजरअंदाज़ करने वाली शर्तें हैं. ईरान ने हर बार स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव के सामने झुकने वाला नहीं है और वह अपनी नीतियों, वैज्ञानिक उपलब्धियों और सुरक्षा क्षमताओं को बचाए रखेगा.

अमेरिका का प्रस्ताव और ईरान की अस्वीकृति
मध्य पूर्व में ओमान की मध्यस्थता के ज़रिये अमेरिका ने ईरान को एक प्रस्ताव भेजा, जिसमें उसने खुद को बातचीत की पेशकश करने वाला बताया. लेकिन असल में यह प्रस्ताव ईरान के वैध परमाणु कार्यक्रमों को सीमित करने, उसके मिसाइल कार्यक्रमों पर नियंत्रण लगाने और उसे अमेरिका‑निर्धारित शर्तों पर चलने के लिये मजबूर करने की कोशिश थी. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने खुद कहा कि यह प्रस्ताव अस्पष्टताओं से भरा था और इसमें ईरान के प्रमुख हितों का सम्मान नहीं किया गया था. इसलिए ईरान ने इसका औपचारिक जवाब तैयार करने की बात कही.

यह सिर्फ कूटनीति नहीं है. यह सवाल है कि एक संप्रभु देश को क्या अपने विज्ञान, तकनीक, ऊर्जा और सुरक्षा के मूल अधिकारों से समझौता करने के लिये दबाया जा सकता है? ईरान का जवाब है सादा: नहीं.

यूरेनियम संवर्धन: वैज्ञानिक उपलब्धि या अमेरिकी दबाव?
यूरेनियम संवर्धन केवल तकनीकी शब्द नहीं है. यह ईरान के वैज्ञानिक समुदाय की दशकों की मेहनत, स्वतंत्र ऊर्जा नीति, और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है. अमेरिका बार‑बार चाहता है कि ईरान इस प्रक्रिया को रोक दे — भले उसके पास स्पष्ट रूप से परमाणु हथियार बनाने का इरादा न हो. अमेरिका का कहना है कि संवर्धन को बंद करना चाहिए, लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने साफ़ कहा है कि यूरेनियम संवर्धन उसके राष्ट्रीय हित का हिस्सा है और इसे कोई दबाव निकाल नहीं सकता.

यह वह बिंदु है जहाँ अमेरिका और ईरान की मूल समझ में अंतर है. अमेरिका अपने सुरक्षा एजेंडे को “वैश्विक सुरक्षा” के नाम पर थोपता है, लेकिन ईरान इसे अपने वैज्ञानिक और आर्थिक भविष्य पर एक हमला के रूप में देखता है. यही वजह है कि ईरान संवर्धन के लिये कतई पीछे नहीं हटा.

विश्वास की कमी
ईरान ने बार‑बार कहा है कि बात केवल तकनीकी या परमाणु मुद्दों की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का मामला है. उसने अमेरिका से यह भी मांग की कि यदि बातचीत होनी है तो स्पष्ट गारंटी दी जाए कि किसी भी हमले से वह सुरक्षित रहेगा — तभी वह बातचीत के लिए आगे बढ़ेगा. यह मांग यह दर्शाती है कि ईरान को अमेरिका की नीतियों पर भरोसा नहीं है, क्योंकि पिछले दशकों में अमेरिका ने कई बार अप्रत्यक्ष दबाव, प्रतिबंध और सैन्य विकल्पों को बातचीत की आड़ में रखा है.

अगर अमेरिका चाहता है कि ईरान बैठकर बातचीत करे, तो उसे पहले यह भरोसा दिलाना होगा कि उसका राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहेगा, न कि उसे एकतरफ़ा सुझावों और धमकियों के सामने झुकाया जाए.

क्षेत्रीय समीकरण और अमेरिका की रणनीति
अमेरिकी रणनीति केवल ईरान को सीमित करने तक नहीं रुकती. वह चाहती है कि क्षेत्रीय ताकतों के बीच ईरान की भूमिका कम हो जाए, ताकि अमेरिकी मिडिल ईस्ट में अपनी प्राथमिकता और दबदबा बनाए रख सके. इसके लिये उसने कभी सीधा सैन्य दबाव, कभी आर्थिक प्रतिबंध, और कभी राजनयिक अलगाव का रास्ता अपनाया. लेकिन ईरान ने इन सबके आगे अपने क्षेत्रीय हितों, सहयोगियों और सुरक्षा नेटवर्क को जीवित रखा है. यही वजह है कि अमेरिका कई बार पीछे हटता भी दिखा, जब उसे पता था कि ईरान का जवाब गंभीर होगा.

यह संघर्ष केवल ईरान और अमेरिका के बीच कुछ विदेशी नीति का टकराव नहीं है — यह दो अलग‑अलग दृष्टिकोणों का टकराव है: एक वह दृष्टिकोण जो अपनी शक्ति को दूसरों पर थोपता है, और दूसरा वह दृष्टिकोण जो अपने अधिकारों को बचाने के लिये दृढ़ता से खड़ा है.

युद्ध नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की रक्षा
अमेरिका कई बार चाहता रहा है कि ईरान कुछ प्रतिबंधों के आगे झुक जाए ताकि वह अपने रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल कर सके. लेकिन ईरान ने यह साफ़ कर दिया कि वह युद्ध नहीं चाहता, न ही वह समझौता इसलिए करेगा कि उसे धमकियाँ मिलें. वह प्रतिरोध को अपनी सुरक्षा नीति का आधार मानता है. यह नीति केवल सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं है, बल्कि राजनयिक स्वतंत्रता, वैज्ञानिक प्रगति, और राष्ट्रीय सम्मान पर आधारित है. यही वजह है कि ईरान सीधे अमेरिका के साथ बातचीत को भी तभी आगे बढ़ाने को तैयार है जब भरोसा और सुरक्षा सुनिश्चित हो.

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