होर्मुज़ में जहाज़ों की आवाजाही पर फैसला अब अमेरिका के हाथ में: अराक़ची
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची का कहना है कि, तेहरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए सात दिनों की एक ठोस योजना पेश की है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका ईरान पर सैन्य दबाव जारी रखते हुए समुद्री सुरक्षा और जहाज़ों की आवाजाही सामान्य होने की उम्मीद नहीं कर सकता।
इराक़ की राजधानी बग़दाद में शनिवार को इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के विदेश मंत्रियों की 52वीं परिषद की बैठक में बोलते हुए अराक़ची ने कहा कि, ईरान ने क़तर के माध्यम से यह प्रस्ताव भेजा है। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यक शर्तें पूरी की जाती हैं, तो ईरान इस रणनीतिक जलमार्ग से जहाज़ों की आवाजाही बहाल करने के लिए तैयार है।
उन्होंने कहा, “क़तर के माध्यम से हमने सात दिनों की एक ठोस योजना प्रस्तुत की है। यदि आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो सात दिनों के भीतर जलडमरूमध्य को फिर से खोला जा सकता है और समुद्री आवाजाही सामान्य की जा सकती है। अब फैसला अमेरिका के हाथ में है।”
अराक़ची ने आगे कहा कि ईरान जलडमरूमध्य में सुरक्षित और निर्बाध नौवहन सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने दावा किया कि समुद्री यातायात में व्यवधान अमेरिका और इस्राईल की सैन्य आक्रामकता तथा उसके बाद अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण पैदा हुआ।
उन्होंने कहा, “सुरक्षा को उसी तरह के और क़दम उठाकर बहाल नहीं किया जा सकता। किसी देश पर बमबारी करना, उसे पूरी तरह तबाह करने की धमकी देना और उस पर नाकेबंदी लगाना—और फिर यह उम्मीद करना कि समुद्री आवाजाही की सुरक्षा सामान्य हो जाएगी—संभव नहीं है।”
अराक़ची ने पहले किए गए कूटनीतिक प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका ने 17 जून को इस्लामाबाद में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी, जबकि क़तर ने सहयोग प्रदान किया था।
उन्होंने कहा कि इसके बाद ईरान ने जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही को सुगम बनाने के लिए ओमान के साथ तकनीकी बातचीत शुरू की थी।
ईरानी विदेश मंत्री के अनुसार, समुद्री यातायात दो सप्ताह के भीतर युद्ध से पहले के स्तर के लगभग 60 प्रतिशत तक पहुँच गया था। हालांकि, बाद में अमेरिका द्वारा उठाए गए क़दमों और सैन्य कार्रवाई ने समझौते को लागू करने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर दी।
अराक़ची ने आगे कहा कि तेहरान ने बार-बार सद्भावना के साथ बातचीत की कोशिश की है, लेकिन इसके जवाब में उसे सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं के कारण ईरान का विश्वास गहराई से प्रभावित हुआ है और विश्वसनीय गारंटी के बिना नए सिरे से बातचीत की संभावनाओं को लेकर संदेह पैदा हुआ है। इन चिंताओं के बावजूद उन्होंने कहा कि ईरान ने कूटनीति के रास्ते बंद नहीं किए हैं।
इस्लामिक सहयोग संगठन के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए अराक़ची ने कहा कि ईरान की सैन्य कार्रवाइयाँ अपने नागरिकों, संप्रभुता और वैध हितों की रक्षा के लिए उठाए गए कदम हैं। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि अपने अधिकारों की रक्षा करना शांति की दिशा में प्रयास करने के विपरीत है।
उन्होंने कहा, “हम युद्ध की कीमत जानते हैं और यही कारण है कि हम शांति को महत्व देते हैं।”
अराक़ची ने OIC से संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों का पालन करने का भी आह्वान किया। उन्होंने तर्क दिया कि इन सिद्धांतों को सभी देशों पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “हमारे क्षेत्र की समस्याओं का सबसे अच्छा समाधान इसी क्षेत्र के देशों द्वारा, क्षेत्र के भीतर ही निकाला जा सकता है, इससे पहले कि दूर-दराज़ की शक्तियाँ इन समस्याओं को युद्ध का बहाना बना लें।” उन्होंने क्षेत्रीय देशों से सुरक्षा के मुद्दों पर आपसी सहयोग करने की अपील की। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि देशों को अपनी भूमि या बुनियादी ढाँचे का इस्तेमाल पड़ोसी देशों पर हमले करने के लिए नहीं होने देना चाहिए।


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