आज़रबैजान ने ग़ाज़ा में सैनिक भेजने के लिए रखी शर्त
अमेरिका द्वारा ग़ाज़ा में एक बहुराष्ट्रीय बल (Multinational Force) तैनात करने की कोशिशों के बीच, आज़रबैजान ने इसमें भागीदारी के लिए अपनी शर्त रखी है। अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा है कि, जब तक हमास और इज़रायल के बीच की लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती, तब तक उनका देश ग़ाज़ा में प्रस्तावित “स्थिरता बल” (Stabilization Force) के तहत कोई भी सैनिक नहीं भेजेगा।
फिलिस्तीनी समाचार एजेंसी मा’आन के अनुसार, अमेरिका ने इस हफ्ते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो मसौदा प्रस्ताव पेश किया है, उसमें आज़रबैजान को उन देशों में से एक बताया गया है जो पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे अन्य इस्लामी देशों के साथ मिलकर ग़ाज़ा में “स्थिरता बल” के लिए सैनिक भेज सकते हैं।
इस योजना के तहत “आंतरिक सुरक्षा बल” (Internal Security Force – ISF) नामक एक इकाई बनाई जानी है, जिसमें लगभग 20,000 सैनिक शामिल हो सकते हैं। यह बल इज़रायल, मिस्र और फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण के समन्वय में काम करेगा।
टाइम्स अख़बार से बातचीत करने वाले राजनयिकों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ज़ ने सुरक्षा परिषद को बताया कि अगर यह योजना पारित नहीं होती, तो “युद्ध-विराम का पतन” (collapse of ceasefire) हो सकता है।
इसी बीच, रायटर्स ने आज़रबैजान के विदेश मंत्रालय के एक सूत्र के हवाले से लिखा:
“हम अपने सैनिकों को ख़तरे में नहीं डालना चाहते।”
उसने आगे कहा:
“यह कदम केवल तब उठाया जाएगा जब सभी सैन्य गतिविधियाँ पूरी तरह से रुक जाएँगी।” साथ ही, इस मुद्दे पर कोई भी निर्णय लेने से पहले बाको की संसद की मंज़ूरी आवश्यक होगी।आज़रबैजान की संसद की सुरक्षा समिति के अध्यक्ष ने भी रायटर्स को बताया कि, उन्हें अभी तक इस विषय पर कोई मसौदा प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।
इस दस्तावेज़ के अनुसार, सुरक्षा परिषद ने कहा है कि, ग़ाज़ा की स्थिति “क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा” है और उसने वहाँ पुनर्निर्माण और स्थिरीकरण के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। हालाँकि, ये कदम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय 7 के तहत नहीं उठाए जाएँगे, यानी सदस्य देशों को बल प्रयोग (military enforcement) की अनुमति नहीं दी जाएगी।
पहले हारेट्ज़ अख़बार ने भी लिखा था कि, आज़रबैजान ग़ाज़ा में किसी अंतरराष्ट्रीय बल में शामिल होने को लेकर संशय में है। यह संदेह संभवतः देश की कूटनीतिक संवेदनशीलताओं, क्षेत्रीय समीकरणों और घरेलू या अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को लेकर चिंताओं के कारण है।


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