सनआ: यमन के अधिकारियों ने सऊदी अरब पर आरोप लगाया है कि वह मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय यमन के खिलाफ आक्रामक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। यमनी अधिकारियों ने साफ कहा है कि अगर किसी भी तरह की आक्रामक कार्रवाई की गई, तो उसका उचित और कड़ा जवाब दिया जाएगा।
यमन द्वारा सऊदी अरब के खिलाफ अपनाई जा रही नीति “नाकाबंदी के बदले नाकाबंदी” के तहत यमन की सर्वोच्च राजनीतिक परिषद के वरिष्ठ सदस्य डॉ. अब्दुल अज़ीज़ बिन हबतूर ने कहा कि यमनी सशस्त्र बल देश के खिलाफ होने वाली संदिग्ध और शत्रुतापूर्ण गतिविधियों पर लगातार करीबी नजर रख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यमन में सऊदी समर्थित लड़ाकों की मौजूदगी और दुश्मन द्वारा नए सैन्य हालात पैदा करने की कोशिश का यमनी सशस्त्र बल पूरी मजबूती के साथ जवाब देंगे। यमनी सेना का मुख्य उद्देश्य देश की सुरक्षा, स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा करना है।
बिन हबतूर के अनुसार, संघर्ष को बढ़ने से रोकने का सबसे आसान रास्ता यह है कि सऊदी समर्थित लड़ाकों की सैन्य गतिविधियों और शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों को रोका जाए। इसके साथ ही यमन पर दबाव डालने के बजाय संघर्ष की असली वजहों को दूर करने और शांति समझौते को गंभीरता तथा जिम्मेदारी के साथ लागू किया जाए।
उन्होंने कहा कि यमन में सऊदी सैनिकों और उसके समर्थित लड़ाकों की लगातार मौजूदगी संघर्ष को बढ़ाने की सऊदी नीति का हिस्सा है। इससे पहले भी यमन पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव, हवाई अड्डों की नाकाबंदी तथा यमनी बंदरगाहों पर लगाए गए प्रतिबंध इसी नीति का हिस्सा रहे हैं।
यमनी अधिकारी ने कहा कि इन घटनाओं से स्पष्ट है कि सऊदी अरब अभी भी संघर्ष को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और उसका उद्देश्य यमन को लगातार दबाव में रखना है।
उन्होंने कहा कि सऊदी समर्थित लड़ाकों के जरिए संघर्ष को यमन के अंदर ले जाने की कोशिश से इस संघर्ष में सऊदी अरब की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। रियाज़ को अपनी कार्रवाइयों के परिणामों की जिम्मेदारी से बचाया नहीं जा सकता।
बिन हबतूर ने कहा कि यमन युद्ध में वापस लौटना नहीं चाहता और उसने पिछले कई वर्षों से शांति प्रक्रिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि यमन अपने दुश्मन को युद्धविराम का फायदा उठाकर सैन्य तैयारी करने या मैदान में नए सैन्य हालात पैदा करने की अनुमति देगा।
उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका और इस्राईल के समर्थन पर सऊदी अरब का भरोसा, यमन के अंदर संघर्ष को अपने समर्थित लड़ाकों के जरिए संचालित करना और इस तरह रियाज़ को संघर्ष के परिणामों से बचाने की कोशिश पहले से हारा हुआ दांव है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यमन की धरती को संघर्ष का खुला मैदान नहीं बनने दिया जाएगा। अगर दुश्मन ने कोई कार्रवाई की, तो यमन का जवाब उस कार्रवाई की प्रकृति के अनुरूप होगा।
इसी मुद्दे पर अंसारुल्लाह के राजनीतिक कार्यालय के सदस्य मोहम्मद अल-फ़रह ने कहा कि यमन के मामले में सऊदी अरब की नीतियों और बयानों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि सऊदी अरब एक ही समय में अलग-अलग और एक-दूसरे के विपरीत राजनीतिक तथा सैन्य भूमिकाएं निभाने की कोशिश कर रहा है, जबकि उसे अपने पिछले फैसलों और नीतियों की जिम्मेदारी का सामना करना पड़ रहा है।
अल-फ़रह के अनुसार, सऊदी अरब एक साथ युद्ध भी करना चाहता है, समझौता भी करना चाहता है, जीत का दावा भी करना चाहता है और खुद को मध्यस्थ के रूप में भी पेश करना चाहता है।
उन्होंने कहा कि रियाज अमेरिका को खुश रखने की कोशिश करता है और साथ ही इस्राईल के साथ सहयोग करते हुए खुद को इस्लामी दुनिया का नेता तथा फ़िलिस्तीन के मुद्दे का समर्थक भी दिखाना चाहता है।
यमन के संबंध में उन्होंने कहा कि वर्षों तक यमन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई, नाकाबंदी और उसके आंतरिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप के बाद अब सऊदी अरब खुद को एक कठिन स्थिति में पाता है।
उनके अनुसार, सऊदी अरब के सामने दो मुश्किल विकल्प हैं: या तो वह मध्यस्थ होने का दावा करता रहे, जबकि उसके सहयोगी और समर्थित लड़ाके निशाना बनते रहें; या फिर सीधे सैन्य टकराव में शामिल हो, जिसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अल-फ़रह ने कहा कि सऊदी अरब यमन में अपने समर्थित लड़ाकों की मदद करते हुए खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करके अपनी कथित तटस्थता की छवि बनाए रखना चाहता है। लेकिन इन दोनों भूमिकाओं को एक साथ निभाना एक स्पष्ट राजनीतिक विरोधाभास है, जिसे उचित ठहराना मुश्किल है।
उन्होंने कहा कि हाल ही में रियाज़ ने गठबंधन बनाने, निंदा करने और राजनीतिक बयान जारी करने का रास्ता अपनाया है, लेकिन इन कदमों से समस्या की जड़ खत्म नहीं होगी और न ही यमन में मौजूद मौजूदा स्थिति बदलेगी।
मोहम्मद अल-फ़रह ने अंत में कहा कि मूल समस्या का समाधान तभी होगा जब यमन के खिलाफ आक्रमण और नाकाबंदी पूरी तरह खत्म की जाए, विदेशी सैन्य मौजूदगी और कब्जा समाप्त हो, युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की जाए, नष्ट हुए क्षेत्रों का पुनर्निर्माण किया जाए और अंततः सऊदी अरब यमन से पूरी तरह बाहर निकल जाए।


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