इस्राईल ने सऊदी अरब की पाठ्य पुस्तकों में बदलाव और क़ुरान की आयात हटाने का स्वागत किया

तल अवीव: अरब21 के अनुसार, सऊदी अरब की कुछ पाठ्य पुस्तकों में किए गए बदलावों का इस्राईल में स्वागत किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी पाठ्यक्रम से “मुसलमान कुद्स को कभी नहीं छोड़ेंगे” जैसे वाक्य को हटा दिया गया है। इस कदम का मध्य पूर्व के शैक्षिक पाठ्यक्रमों पर नजर रखने वाले एक इस्राईली संगठन ने स्वागत किया है।

इम्पैक्ट-एसई (IMPACT-se) के कार्यकारी निदेशक मार्कस शेफ ने कहा कि सऊदी अरब के शैक्षिक पाठ्यक्रमों की संस्था द्वारा की गई समीक्षा देश की शिक्षा व्यवस्था में जारी “सकारात्मक सुधारों” की दिशा को दर्शाती है।

उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम में उस सामग्री में कमी आई है, जिसे उनकी संस्था “चरमपंथी” या “यहूदी-विरोधी” मानती है। इसके साथ ही, पाठ्यक्रम में इस्राईल और ज़ायोनीवाद के विषय को प्रस्तुत करने के तरीके में भी बदलाव किए गए हैं।

इस्राईल की ओर से सऊदी पाठ्यक्रम में बदलाव का स्वागत ऐसे समय में किया गया है, जब इस्राईली राजनेताओं की ओर से मस्जिदे-अक्सा को हटाकर उसकी जगह कथित ‘हैकल’ (मंदिर) के निर्माण की मांगें लगातार सामने आती रही हैं।

इसी बीच, इस्राईली अधिकारियों ने मकबूजा कुद्स में स्थित मस्जिदे-अक्सा के अंदर यहूदी अतिक्रमणकारियों को धार्मिक प्रोग्राम करने की अनुमति दे दी है। इस कदम की व्यापक आलोचना हुई और इसे ऐतिहासिक स्थिति तथा मौजूदा व्यवस्था के एक और उल्लंघन के रूप में देखा गया।

इम्पैक्ट-एसई ने सऊदी पाठ्य पुस्तकों से कुफ्र और पाप से संबंधित कुछ कुरआनी आयतों को हटाए जाने का भी स्वागत किया है। संस्था के अनुसार, 11वीं कक्षा की एक इतिहास की किताब में “ज़ायोनी दुश्मन” शब्द को बदलकर “इस्राईली कब्जाधारी” कर दिया गया है।

हालांकि, संस्था ने इस बदलाव को भी पर्याप्त नहीं माना। उसका कहना है कि “इस्राईली कब्जाधारी” शब्द का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि सऊदी पाठ्यक्रम में अभी भी इस्राईल को आधिकारिक रूप से मान्यता देने का अभाव बना हुआ है।

इन आलोचनाओं के बीच यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि इस्राईली सरकार फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का लगातार विरोध करती रही है। इस्राईली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले नवंबर में कथित तौर पर कहा था कि “फिलिस्तीनी राज्य नहीं होगा” और यह स्थापित नहीं किया जाएगा।

इस प्रकार, सऊदी अरब के पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर इस्राईली संस्था की सकारात्मक प्रतिक्रिया के बावजूद, फिलिस्तीन, यरुशलम और मस्जिद अल-अक्सा जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गहरे राजनीतिक और वैचारिक मतभेद अब भी कायम हैं।

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