अर्दोगान को ट्रंप ने फिर दिया F-35 का झांसा, नेतन्याहू ने किया विरोध

अमेरिका और तुर्की के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वॉशिंगटन तुर्की पर लगे प्रतिबंध हटाने की तैयारी में है। अगर ऐसा होता है तो तुर्की के लिए अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमानों की खरीद का रास्ता दोबारा खुल सकता है।

इस घटनाक्रम के बीच तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगान ने मंगलवार को अंकारा एयरपोर्ट पर खुद पहुंचकर ट्रंप का स्वागत किया। विदेशी नेताओं के लिए अर्दोगान का इस तरह व्यक्तिगत रूप से स्वागत करना एक असामान्य कदम माना जा रहा है।

ट्रंप ने तुर्की यात्रा के दौरान अर्दोगान को अपना करीबी मित्र बताया और कहा कि वह तुर्की के राष्ट्रपति का बहुत सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत होगी और यह संबंधों को मजबूत करने का अवसर है।

तुर्की और अमेरिका के बीच तनाव तब बढ़ा जब अंकारा ने रूस से एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीद लिया। अमेरिका का कहना था कि रूसी प्रणाली की मौजूदगी नाटो की सुरक्षा व्यवस्था और एफ-35 जैसी अत्याधुनिक तकनीक के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

इसी वजह से अमेरिका ने 2020 में तुर्की पर प्रतिबंध लगाए और एफ-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम से उसे बाहर कर दिया था। तुर्की ने इस फैसले का लगातार विरोध किया।

अब ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका तुर्की पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने मित्र देशों पर प्रतिबंध लगाना नहीं चाहता।

प्रतिबंध हटने की संभावना से इस्राईल चिंतित है।  प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि तुर्की को एफ-35 विमान देना केवल हथियारों की बिक्री का मामला नहीं है, बल्कि इसके क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

नेतन्याहू का तर्क है कि अत्याधुनिक अमेरिकी लड़ाकू विमान मिल जाने से तुर्की अपने सैन्य प्रभाव को और बढ़ा सकता है। तल अवीव को डर है कि भविष्य में यह तकनीक मध्य-पूर्व की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि ट्रंप प्रशासन का मानना है कि तुर्की जैसे नाटो सहयोगी के साथ संबंध सुधारना अमेरिका के रणनीतिक हित में है।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या अमेरिका वास्तव में प्रतिबंध हटाता है और क्या इसके बाद तुर्की को एफ-35 कार्यक्रम में दोबारा शामिल किया जाता है। यह फैसला न केवल अमेरिका-तुर्की संबंधों को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति पर भी असर डाल सकता है।

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