अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ब्रांड नेम है: डीवाई चंद्रचूड़

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ब्रांड नेम है: डीवाई चंद्रचूड़

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। गुरुवार 11 जनवरी को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद और शादान फरासत ने दलीलें पेश करते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी बताया।

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षकार यानी केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं से पूछा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं इससे लोगों को क्या फर्क पड़ता है? कोर्ट ने कहा कि यह अल्पसंख्यक टैग के बिना भी राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि एएमयू ब्रांड नेम है।

इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि अगर 1967 का एस अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ग़लत मान भी लें तो इसका प्रभाव 2006 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर क्या होगा ? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में 1981 के संशोधन अधिनियम के उस प्रावधान को रद्द कर दिया था जिसके जरिए एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया गया था।

1967 के एस अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक केंद्रीय विश्वविद्यालय इसलिए इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता है। इस फैसले के बाद ही केंद्र सरकार ने 1981 के संशोधन अधिनियम के द्वारा इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया था।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने दलीलें दी कि एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे के कारण मुस्लिम महिलाएं बड़ी संख्या में यहां से शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। यह अल्पसंख्यक संस्थान नहीं रहेगा तो उनकी शिक्षा में बाधा आ सकती है। उन्होंने कहा कि एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा और महिला शिक्षा साथ-साथ चल रहा है। इसके अल्पसंख्यक दर्जा के कारण मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा मिला है।

उन्होंने कहा कि एक अल्पसंख्यक संस्थान भी राष्ट्रीय महत्व का संस्थान हो सकता है। यह जरूरी नहीं है कि सिर्फ बहुसंख्यक ही राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्थापित कर सकते हैं। उनकी इस दलील पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आर्टिकल 30 का मकसद अल्पसंख्यकों को किसी समूह में विभाजित करना नहीं है।

उनकी इस दलील पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आर्टिकल 30 का मकसद अल्पसंख्यकों को किसी समूह में विभाजित करना नहीं है। इसलिए अगर आप अन्य समुदायों के लोगों को अपने संस्थान से जुड़ने देते हैं तो यह अल्पसंख्यक संस्थान प्रकाशक के रूप में उसके कैरेक्टर पर प्रभाव नहीं डालता है।

उन्होंने कहा कि कानून के मुताबिक आपको अपने संस्थान में उन लोगों को शामिल करना होगा जो अल्पसंख्यक नहीं है। वहीं इस मामले में अपनी दलीलें देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर कानून इस तरह से हस्तक्षेप करता है तब एक अल्पसंख्यक संस्थान को आर्टिकल 30 के तहत मिले प्रशासन के अधिकार में बाधा आएगी।

इस पर सीजेआई ने कहा कि इस आर्टिकल का अनिवार्य तत्व अल्पसंख्यकों को उनकी पसंद का अधिकार प्रदान करना है।

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