अमेरिका चाहता है कि, भारत उसकी शर्तें  स्वीकार करे: रघुराम राजन

अमेरिका चाहता है कि, भारत उसकी शर्तें  स्वीकार करे: रघुराम राजन

भारत से आने वाले सामान पर 25% टैरिफ लगाने के अमेरिकी फैसले को भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक गंभीर वार माना जाना चाहिए। यह बात शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिज़नेस के प्रोफेसर और भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक वीडियो इंटरव्यू में कही।

राजन ने कहा कि, अमेरिका चाहता है कि, भारत उसकी शर्तों को स्वीकार करे, इसलिए ऐसे दंडात्मक टैरिफ लगाए गए हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को कारों पर आयात शुल्क में काफी कमी करनी चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों में निर्णय लेते समय डेयरी और कृषि उत्पादकों के हितों का ध्यान रखना ज़रूरी है।

उन्होंने कहा कि भारत में निवेश को आकर्षित करने के लिए सरकार को “नियमों की अनिश्चितता” और “टैक्स संबंधी समस्याओं” जैसी बाधाओं को दूर करना होगा। यही वजह है कि कई विदेशी निवेशक भारत आने से हिचकते हैं और निवेश में कमी करते हैं।

जब उनसे पूछा गया कि अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते और टैरिफ बढ़ाने से वैश्विक व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, तो उन्होंने कहा कि हर देश अमेरिका से अपने लिए अलग-अलग डील चाहता है। समस्या यह है कि, एक ही उत्पाद पर कुछ देशों से ज्यादा और कुछ से कम टैरिफ वसूला जा रहा है, जिससे सप्लाई चेन उन देशों की ओर जा रही है जहाँ शुल्क कम है, चाहे वहाँ उत्पादन की क्षमता कम ही क्यों न हो।

उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अमेरिका ने चीन पर भारी टैक्स लगाए हैं, इसलिए चीन अपने उत्पादों को पहले मैक्सिको भेजता है और फिर वहाँ से अमेरिका ताकि सीधे टैरिफ से बचा जा सके। इसे रोकने के लिए अमेरिका को और गहन जांच करनी होगी।

राजन ने यह भी कहा कि अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए समस्या यह है कि अब उन्हें कई वस्तुएँ महंगे दामों पर मिलेंगी। भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति कहें कि टैक्स का बोझ विदेशी कंपनियों पर पड़ेगा, लेकिन सच्चाई यह है कि इसका असर उत्पादकों, आयातकों और उपभोक्ताओं तीनों पर पड़ेगा। कितना असर किस पर पड़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा कितनी है। अमेरिका में कई वस्तुओं के दाम पहले ही बढ़ने लगे हैं, जिससे ग्राहकों की क्रय शक्ति में कमी आ रही है।

भारत क्या इस व्यापारिक दबाव से सही दिशा में निपट रहा है? इस सवाल पर राजन ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच चल रही टैरिफ बातचीत अभी केवल इरादों का खुलासा करती है। असली तस्वीर तो उन बारीकियों में है जिन पर अभी बातचीत बाकी है। मसलन, यदि अमेरिका दवाइयों के मुद्दे पर अलग से बातचीत करता है, तो उस सेक्टर के लिए कौन से नियम बनेंगे? इसी तरह, एफडीआई और नॉन-टैरिफ बाधाओं पर भारत किस तरह के समझौते करता है, यह भी अहम होगा।

भारत को किन क्षेत्रों में टैरिफ घटाना चाहिए और क्या कार सेक्टर सबसे अहम है? इस पर राजन ने कहा कि हर देश कार उद्योग को गर्व का विषय मानता है और चाहता है कि, यह मजबूत बने। ऐसे में कारों पर टैरिफ कम करना भारत के लिए एक अच्छा क़दम हो सकता है। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और इस सेक्टर में सुधार होगा।

रघुराम राजन ने भारत को क्या सलाह दी?
रघुराम राजन ने कहा कि भारत को अपने बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और व्यापार में बाधाओं को दूर करने पर लगातार काम करना चाहिए। अगर भारत यह भरोसा दिला दे कि विदेशी और भारतीय निवेशकों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाएगा, तो वह एक आकर्षक गंतव्य बन सकता है। दक्षिण भारत की कुछ राज्यों ने इस दिशा में पहले ही ठोस कदम उठाए हैं और निवेश को आकर्षित किया है।

चाहे निवेश निर्माण में हो या सेवाओं में, यह भारत के लिए लाभकारी है। आज जब पूरी दुनिया की कंपनियाँ अपनी सप्लाई चेन की समीक्षा कर रही हैं, यह भारत के लिए एक मौका है कि वह स्पष्ट संदेश दे — हम निवेश के लिए तैयार हैं। शुरू में निवेशक केवल अमेरिकी बाजार को ध्यान में रखकर भारत आएंगे, लेकिन धीरे-धीरे वे वैश्विक बाजार के लिए भी भारत से उत्पादन कर सकते हैं।

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