पाकिस्तान का नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट रहेगा बंद, भारत से दुश्मनी महंगी पड़ी

इस्लामाबाद: पाकिस्तान का बहुचर्चित नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट एक बार फिर गंभीर तकनीकी संकट में फंस गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 969 मेगावाट क्षमता वाला यह जलविद्युत परियोजना अंडरग्राउंड टनल सिस्टम को हुए भारी नुकसान के कारण मार्च 2028 तक बंद रह सकती है। इस परियोजना के लंबे समय तक बंद रहने से पाकिस्तान में सस्ती बिजली की उपलब्धता प्रभावित हुई है और देश की ऊर्जा चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

बताया गया कि परियोजना की स्थिति का खुलासा सार्वजनिक मंच पर नहीं, बल्कि जल संसाधनों पर सीनेट की स्थायी समिति की बैठक के दौरान किया गया। इस दौरान वाप्डा (WAPDA) के चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मोहम्मद सईद ने जानकारी दी कि 969 मेगावाट क्षमता वाले प्लांट की मरम्मत का कार्य जारी है और इसे मार्च 2028 तक दोबारा चालू करने का लक्ष्य रखा गया है।

हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी चुनौतियों को देखते हुए तय समय पर परियोजना का पूरी तरह बहाल होना आसान नहीं होगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, परियोजना की मुख्य हेडरेस टनल को गंभीर क्षति पहुंची है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, भू-वैज्ञानिक परिस्थितियों और इंजीनियरिंग संबंधी कमियों के चलते पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा टनल पर आ गिरा, जिससे संरचना को व्यापक नुकसान हुआ। अधिकारियों का कहना है कि टनल फेल होने के वास्तविक कारणों की जांच अभी भी जारी है।

नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को पाकिस्तान सरकार ने जुलाई 2007 में मंजूरी दी थी और वर्षों की देरी के बाद इसका संचालन शुरू हुआ। करीब 500 अरब रुपये की लागत वाली इस परियोजना को 2024 में चट्टान खिसकने की घटना के बाद बड़ा झटका लगा, जिसके कारण हेडरेस टनल क्षतिग्रस्त हो गई। तब से यह परियोजना बंद पड़ी है।

परियोजना के बंद होने का असर पाकिस्तान के बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। सस्ती जलविद्युत उपलब्ध न होने से राष्ट्रीय ग्रिड को महंगी थर्मल बिजली पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे बिजली उत्पादन की लागत बढ़ी है, जबकि उपभोक्ताओं से पहले से ही इस परियोजना के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने की चर्चा भी होती रही है।

नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का संबंध सिंधु जल प्रणाली से भी है। पाकिस्तान ने इस परियोजना को भारत के किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के जवाब में विकसित किया था। यही वजह है कि यह परियोजना लंबे समय से तकनीकी, रणनीतिक और जल विवादों के संदर्भ में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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