हम इज़रायल के लिए नहीं मरना चाहते: अमेरिकी सैनिक
अमेरिकी सैनिकों में बढ़ती नाराज़गी अब केवल एक सैन्य मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि यह युद्ध नैतिक, राजनीतिक और रणनीतिक—तीनों स्तरों पर विफल हो रहा है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के खिलाफ चल रहे इस युद्ध में शामिल अमेरिकी सैनिक खुद इस संघर्ष के उद्देश्य पर सवाल उठा रहे हैं और खुलकर कह रहे हैं कि वे “इज़राइल के लिए मरना नहीं चाहते।”
यह स्थिति सीधे तौर पर उस नीति की असफलता को उजागर करती है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने मिलकर आगे बढ़ाया। यह युद्ध किसी स्पष्ट अमेरिकी हित के बजाय, एक क्षेत्रीय एजेंडे को थोपने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
सैनिकों का गिरता मनोबल और बढ़ता विरोध
रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी सैनिकों के बीच तनाव, डर और अनिश्चितता चरम पर है। जब खुद सेना के अंदर यह भावना पैदा हो जाए कि मिशन का कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं है, तो यह किसी भी युद्ध की सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि ऐसी स्थिति में सैनिकों का मनोबल टूट जाता है और वे आदेशों पर सवाल उठाने लगते हैं।
ट्रंप की नीतियों पर सवाल
कई विश्लेषकों और पूर्व अधिकारियों ने भी इस युद्ध के लिए सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया है। एक पूर्व CIA प्रमुख ने साफ कहा कि यह संकट ट्रंप की गलत नीतियों और गलत आकलन का परिणाम है।
ट्रंप प्रशासन ने बिना दीर्घकालिक रणनीति के युद्ध को आगे बढ़ाया, जिससे न केवल अमेरिकी सैनिकों की जान खतरे में पड़ी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अस्थिरता बढ़ी।
इज़रायल की भूमिका पर बढ़ते सवाल
इस युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर ही यह धारणा मजबूत हो रही है कि यह संघर्ष मुख्य रूप से बेंजामिन नेतन्याहू की आक्रामक नीतियों का परिणाम है, जिसमें अमेरिका को खींच लिया गया।
कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि अमेरिकी जनता और सैनिक इस बात से असहज हैं कि उन्हें ऐसे युद्ध में झोंका जा रहा है, जिसका सीधा लाभ अमेरिका को नहीं बल्कि इज़राइल को मिल रहा है।
मानवीय और सैन्य नुकसान
इस युद्ध में सैकड़ों अमेरिकी सैनिक घायल हो चुके हैं और कई की मौत हो चुकी है।
दूसरी ओर, ईरान ने लगातार जवाबी कार्रवाई करते हुए यह दिखाया है कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है, बल्कि अपने संप्रभु अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है।
ईरान की मजबूती और आत्मनिर्भरता
इन परिस्थितियों में ईरान की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई देती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, भारी हमलों के बावजूद ईरान की राजनीतिक और सैन्य संरचना कायम है और वह और अधिक सख्त होकर उभरा है।
यह इस बात का संकेत है कि बाहरी दबाव और युद्ध के जरिए किसी देश को झुकाने की नीति हमेशा सफल नहीं होती।
अमेरिकी सैनिकों की यह खुली नाराज़गी इस बात का प्रमाण है कि यह युद्ध न तो न्यायसंगत है और न ही रणनीतिक रूप से सफल। डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों ने न केवल क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाई है, बल्कि अपने ही सैनिकों को एक ऐसे संघर्ष में झोंक दिया है, जिसका कोई स्पष्ट अंत या उद्देश्य दिखाई नहीं देता।
दूसरी ओर, ईरान इस पूरे संघर्ष में अपनी संप्रभुता और आत्मसम्मान की रक्षा करता हुआ दिखाई दे रहा है, जिससे यह युद्ध एकतरफा नहीं बल्कि जटिल और बहुआयामी बन गया है।


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