यूरोप को हमसे ज़्यादा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की ज़रूरत है: अमेरिकी रक्षामंत्री 

यूरोप को हमसे ज़्यादा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की ज़रूरत है: अमेरिकी रक्षामंत्री 

अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने अपनी साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि, ईरान के पास एक गंभीर समझौते का ऐतिहासिक अवसर है और अब फैसला उन्हीं के हाथ में है। उन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बारे में कहा कि यूरोप को इस जलडमरूमध्य की हमसे कहीं ज़्यादा आवश्यकता है।

उन्होंने आगे कहा कि,

यूरोप और एशिया कई दशकों से अमेरिका के समर्थन का लाभ उठाते रहे हैं, लेकिन अब “मुफ़्त में फायदा उठाने” का दौर खत्म हो चुका है। हेगसेथ ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर यूरोपीय देशों के प्रयासों को गंभीर नहीं बताया और कहा कि पिछले हफ्ते इस मुद्दे पर हुई यूरोप की बैठक “हास्यास्पद” थी।

अमेरिका की “मुफ़्त लाभ” वाली टिप्पणी पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि कई विश्लेषकों का मानना है कि वाशिंगटन ने खुद अपने रणनीतिक हितों के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेप किया है, जिसका खामियाजा स्थानीय देशों को भुगतना पड़ा है। उन्होंने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि, तेहरान की घेराबंदी लगातार कड़ी होती जा रही है और हालात पर हमारा पूरा नियंत्रण है।

पीट हेगसेथ ने कहा कि एशिया और यूरोप के अमेरिकी सहयोगी दशकों से हमारी सुरक्षा सहायता से लाभान्वित होते रहे हैं, लेकिन अब अमेरिका को सक्षम और वफादार सहयोगियों की आवश्यकता है। उन्होंने दोहराया कि अमेरिका से “मुफ़्त में लाभ लेने” का समय अब समाप्त हो चुका है।

यह बयान न सिर्फ़ अहंकारी सोच को दर्शाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना के भी खिलाफ है। ईरान के संदर्भ में उनकी भाषा और भी आक्रामक रही, जहां उन्होंने “घेराबंदी” और “नियंत्रण” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए तेहरान पर दबाव बनाने की कोशिश की।

वास्तव में, होर्मुज़ जलडमरूमध्य एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है, जो केवल किसी एक देश की ताकत या नियंत्रण का विषय नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार का साझा मार्ग है। ऐसे में अमेरिका द्वारा इसे राजनीतिक हथियार के रूप में पेश करना अंतरराष्ट्रीय नियमों और संतुलन के खिलाफ माना जा रहा है।

ईरान लंबे समय से यह कहता आया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और संप्रभुता का सम्मान करता है, और किसी भी तरह के दबाव या धमकी के सामने झुकने वाला नहीं है। तेहरान का यह भी मानना है कि बातचीत केवल समानता और सम्मान के आधार पर ही संभव है, न कि एकतरफा शर्तों और सैन्य दबाव के जरिए।

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