बांग्लादेश में आम चुनाव की तैयारी, 12 फरवरी को होगा यूनुस की क़िस्मत का फ़ैसला

बांग्लादेश में आम चुनाव की तैयारी, 12 फरवरी को होगा यूनुस की क़िस्मत का फ़ैसला

बांग्लादेश में आम चुनाव की तैयारियां जारी हैं। इसी बीच बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव में हिंदू समुदाय से जुड़े एक व्यापारी को भी टिकट दिया है। गौरतलब है कि इससे पहले के चुनावों में विपक्ष लगभग नदारद था।

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी ने 2014 और 2024 के चुनावों का बहिष्कार किया था और अवामी लीग पर आरोप लगाया था कि उसने प्रशासनिक नियंत्रण, पहले से भरे गए बैलेट बॉक्स और सुरक्षा एजेंसियों की मदद से भारी बहुमत हासिल किया। हालांकि इन चुनावों के जरिए अवामी लीग सत्ता में बनी रही, लेकिन अंततः उसकी पकड़ कमजोर पड़ती चली गई।

सोमवार को देशभर में चुनावी गतिविधियां चरम पर रहीं। देश के विभिन्न हिस्सों में बीएनपी के ‘धान की बालियां’ और जमात-ए-इस्लामी के ‘तराजू’ चुनाव चिह्न वाले पोस्टर जगह-जगह दिखाई दिए। उल्लेखनीय है कि इससे पहले के चुनावों में हर ओर अवामी लीग का ‘नाव’ चिह्न ही नजर आता था।

विशेषज्ञों के अनुसार 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में बीएनपी को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। पार्टी 300 में से 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान का कहना है कि उन्हें सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत मिलने का पूरा भरोसा है, हालांकि मुकाबला एकतरफा नहीं है।

बीएनपी इस चुनाव को निर्णायक परीक्षा मान रही है। पार्टी नेतृत्व अब जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती संगठनात्मक ताकत को स्वीकार कर रहा है। वहीं जमात-ए-इस्लामी बीएनपी पर अतीत में सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाती है और कहती है कि निराश मतदाता उसे एक विकल्प के रूप में देख सकते हैं।

जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में एक गठबंधन भी मजबूत स्थिति में उभर चुका है, जिसे युवाओं से जुड़ी एक नई राजनीतिक पार्टी का समर्थन प्राप्त है। इस नई पार्टी के अधिकांश सदस्य 30 वर्ष से कम उम्र के हैं।

इसी बीच खुलना-1 निर्वाचन क्षेत्र से जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार कृष्णा नंदी ने कहा है कि यदि जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है तो बांग्लादेश के हिंदू नागरिक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन व्यतीत करेंगे। उन्होंने कहा कि इस्लामी राजनीतिक दलों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर जो आशंकाएं जताई जाती हैं, वे निराधार हैं।

अरब मीडिया में प्रकाशित अपने एक लेख में कृष्णा नंदी ने कहा कि किसी इस्लामी पार्टी द्वारा एक हिंदू को उम्मीदवार बनाना इस बात का प्रमाण है कि जमात-ए-इस्लामी धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व और उनकी सुरक्षा करने की क्षमता रखती है। उन्होंने दावा किया कि जमात-ए-इस्लामी की सरकार में किसी भी हिंदू को देश छोड़ने या भारत पलायन के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा और कानून एवं न्याय के माध्यम से समानता सुनिश्चित की जाएगी।

उन्होंने बताया कि वे 2003 में जमात-ए-इस्लामी में इसलिए शामिल हुए थे क्योंकि वे पार्टी के अनुशासन, जवाबदेही और नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीति से प्रभावित थे। जुलाई 2024 में हुई अशांति की घटनाओं का हवाला देते हुए कृष्णा नंदी ने दावा किया कि जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं ने अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा तथा मंदिरों और पूजा स्थलों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

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