ईरान ने जॉर्डन में, अमेरिकी ठिकानों पर हमलों पर ज़ोर क्यों दिया?

ईरान ने जॉर्डन में, अमेरिकी ठिकानों पर हमलों पर ज़ोर क्यों दिया?

पिछले कुछ दिनों में जॉर्डन, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। इस दौरान जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार पाँच दिनों तक कई बार हमले हुए। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इन हमलों में दो अमेरिकी सैनिक मारे गए, जबकि कई अन्य घायल हुए।

रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध शुरू होने से पहले और उसके शुरुआती चरण में अमेरिका ने बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर से अपने कुछ सैनिकों, सैन्य विमानों और अन्य उपकरणों को जॉर्डन तथा इस्राईल स्थानांतरित किया। इसका उद्देश्य क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को मज़बूत करना और अभियानों का संचालन अधिक प्रभावी ढंग से करना बताया गया।

द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, यह बदलाव केवल सैन्य रणनीति का हिस्सा नहीं था। रिपोर्ट में कहा गया कि क्षेत्र के कुछ सहयोगी देशों ने अपनी ज़मीन और हवाई क्षेत्र का उपयोग ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक सैन्य अभियानों के लिए सीमित कर दिया था। ऐसे में जॉर्डन अमेरिकी सैन्य गतिविधियों, रसद, निगरानी और समन्वय का एक प्रमुख केंद्र बन गया। इसी कारण जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी ठिकानों का महत्व पहले की तुलना में काफ़ी बढ़ गया।

ईरान समर्थक पक्षों का आरोप है कि जॉर्डन ने अमेरिकी सैन्य बलों को अपनी धरती और हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति देकर क्षेत्रीय संघर्ष में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि जॉर्डन की इस नीति ने उसे अमेरिकी सैन्य अभियानों का महत्वपूर्ण साझेदार बना दिया है, जिसके कारण वहाँ स्थित अमेरिकी ठिकाने हमलों का निशाना बने।

दूसरी ओर, जॉर्डन सरकार इन आरोपों को स्वीकार नहीं करती और कहती है कि उसकी प्राथमिकता अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना है। जॉर्डन का कहना है कि वह किसी भी ऐसे कदम का समर्थन नहीं करता जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़े।

जॉर्डन की ‘कागजी संप्रभुता’ और अमेरिका-इस्राइल से मिलीभगत

ईरान समर्थक गुटों का सीधा आरोप है कि, जॉर्डन की सरकार अपने ही लोगों और अरब जगत की भावनाओं के ख़िलाफ़ जाकर अमेरिकी और यहूदी (Zionist) हितों की कठपुतली बन चुकी है।

प्रत्यक्ष भागीदारी का सबूत

जब जॉर्डन ने अपनी जमीन, सैन्य ठिकानों और हवाई क्षेत्र को अमेरिकी लड़ाकू विमानों और निगरानी उपकरणों के लिए खोल दिया, तो उसने अपनी निष्पक्षता खो दी। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट खुद इस बात की गवाही देती है कि जॉर्डन अब केवल एक मेजबान नहीं, बल्कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों का एक सक्रिय भागीदार (Co-belligerent) बन चुका है।

जॉर्डन का पाखंड

जॉर्डन सरकार का यह दावा कि वह ‘क्षेत्रीय स्थिरता’ के लिए ऐसा कर रही है, पूरी तरह से खोखला है। आप एक तरफ उस सेना को पनाह नहीं दे सकते जो पूरे क्षेत्र को युद्ध में झोंकना चाहती है, और दूसरी तरफ शांति का राग नहीं अलाप सकते। जॉर्डन ने अपने इस कदम से अपनी धरती को सीधे तौर पर युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर लिया है।

ईरान का हमला, एक वैध जवाबी कार्रवाई

इस दृष्टिकोण के तहत, जॉर्डन में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हुए हमले कोई आकस्मिक गोलाबारी नहीं हैं, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति है।

वैध सैन्य लक्ष्य (Legitimate Targets): जब जॉर्डन में मौजूद ठिकाने (जैसे टॉवर 22 या अन्य गुप्त बेस) ईरान और उसके सहयोगियों के खिलाफ जासूसी, रसद (logistics) और आक्रामक हमलों के संचालन केंद्र बन गए, तो अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत भी वे वैध सैन्य लक्ष्य बन जाते हैं।

अमेरिका को कड़ा संदेश

पाँच दिनों तक लगातार हुए हमलों और अमेरिकी सैनिकों की मौत ने वाशिंगटन को यह कड़ा संदेश दिया है कि उसकी सैन्य मौजूदगी अब सुरक्षित नहीं है। यदि अमेरिका क्षेत्रीय शक्तियों को डराने के लिए जॉर्डन को मोहरा बनाएगा, तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।

जॉर्डन के लिए चेतावनी

यह जॉर्डन के शाही शासन के लिए भी एक सीधी चेतावनी है कि यदि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल मुस्लिम देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के खिलाफ पश्चिमी ताकतों को करने देगा, तो वह खुद को सुरक्षित नहीं रख पाएगा।

ईरान के समर्थक गुटों के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम साबित करता है कि अमेरिका मध्य पूर्व में अलग-थलग पड़ रहा है। जॉर्डन जैसे चंद देशों की मदद से वह जो सैन्य जाल बुनने की कोशिश कर रहा है, ‘ईरानी सेना’ उसे ध्वस्त करने में पूरी तरह सक्षम है। जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों पर हुए हमले इस बात का प्रमाण हैं कि विदेशी ताकतों को क्षेत्र से खदेड़ने और उनकी कठपुतली सरकारों को सबक सिखाने का अभियान शुरू हो चुका है।

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