ईरान के साथ युद्ध के कारण अमेरिकी सैनिकों में सेना छोड़ने की मांग
ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी सैन्य अभियान के बीच कुछ अमेरिकी सैन्यकर्मियों में सेना छोड़ने की इच्छा बढ़ती दिखाई दे रही है। खबर के अनुसार, कई सैन्यकर्मियों ने “अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति” (Conscientious Objection) के तहत सैन्य सेवा से अलग होने की प्रक्रिया शुरू की है। उनका कहना है कि पिछले कुछ महीनों में हुई सैन्य कार्रवाइयों ने उनकी नैतिक और कानूनी मान्यताओं को गहराई से प्रभावित किया है।
इन सैन्यकर्मियों की मुख्य चिंता यह है कि उनसे ऐसी कार्रवाइयों में हिस्सा लेने या उनका समर्थन करने की अपेक्षा की जा रही है, जिन्हें वे अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के विरुद्ध मानते हैं। उन्होंने ईरान में नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों, नागरिकों के मारे जाने और मादक पदार्थों की तस्करी के संदिग्ध नावों पर अमेरिकी हमलों का उल्लेख किया। उनका सवाल है कि, जब किसी व्यक्ति या नाव पर अपराध साबित नहीं हुआ हो, तो केवल संदेह के आधार पर उस पर घातक हमला कैसे उचित ठहराया जा सकता है??
ख़बर में पांच अमेरिकी सैन्यकर्मियों का हवाला दिया गया है, जिन्होंने हाल के घटनाक्रमों के बाद सेना से अलग होने की प्रक्रिया शुरू की है। उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए उनके पद, सैन्य शाखा, सेवा अवधि और अन्य व्यक्तिगत विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इन सभी के आवेदन पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
सेंटर ऑन कॉन्साइंस एंड वॉर के अनुसार, ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू होने के बाद conscientious objection से संबंधित मदद मांगने वालों की संख्या सामान्य स्तर से लगभग छह गुना बढ़ गई है। संगठन के प्रतिनिधि माइक प्रिज़नर ने बताया कि आमतौर पर संगठन एक साल में लगभग 50 ऐसे मामलों से निपटता है, जबकि युद्ध शुरू होने के बाद लगभग 140 आवेदकों को स्वीकार किया जा चुका है। खास बात यह है कि इनमें केवल निचले रैंक के सैनिक ही नहीं, बल्कि 10 वर्ष से अधिक अनुभव वाले सैनिक और अधिकारी भी शामिल हैं।
दूसरी ओर, GI Rights Hotline ने भी सहायता मांगने वालों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। संगठन को मार्च में 429 और अप्रैल में 440 अनुरोध मिले। फिलहाल वह लगभग 30 ऐसे सैन्यकर्मियों के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहा है, जो conscientious objection की प्रक्रिया में हैं। युद्ध से पहले यह संख्या आमतौर पर केवल 5 से 10 के बीच रहती थी।
इन सैन्यकर्मियों के मुताबिक, सेना में भर्ती होते समय उनका विश्वास था कि, युद्ध का इस्तेमाल केवल राष्ट्रीय रक्षा या किसी महत्वपूर्ण उद्देश्य को हासिल करने के लिए अंतिम उपाय के रूप में होना चाहिए। लेकिन युद्धों के अस्पष्ट उद्देश्यों, नागरिकों की मौतों और बदलते सैन्य औचित्यों ने उनका विश्वास कमजोर कर दिया।
कुछ सैन्यकर्मियों ने ईरान में पुलों और अन्य नागरिक ढांचे पर हमलों को लेकर विशेष चिंता जताई। उनका मानना है कि सैन्य नेतृत्व क़ानूनी सलाह के जरिए विवादित कार्रवाइयों को उचित ठहराने का रास्ता निकाल सकता है, जबकि कमान की श्रृंखला में कोई व्यक्ति खुलकर उन्हें रोकने की कोशिश नहीं करता।
पूर्व अमेरिकी सैनिक और इराक़ युद्ध के अनुभवी प्रिज़नर के अनुसार, ईरान युद्ध कई सैन्यकर्मियों के लिए “टूटने का बिंदु” बन गया है। उनके मुताबिक, अधिकांश लोग अपनी सुरक्षा से ज्यादा इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कहीं वे ऐसी कार्रवाई में शामिल न हो जाएं, जिसे वे नैतिक रूप से ग़लत मानते हैं और जिसका उन्हें भविष्य में पछतावा हो।
कुल मिलाकर, खबर यह संकेत देती है कि ईरान युद्ध ने अमेरिकी सेना के भीतर नैतिक जिम्मेदारी, अंतरराष्ट्रीय कानून और सैन्य आदेशों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि conscientious objection के आवेदन करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है, हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगा कि अमेरिकी सेना में व्यापक स्तर पर विद्रोह या सामूहिक रूप से सेवा छोड़ने की स्थिति पैदा हो गई है।


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