आर्थिक दबाव ईरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर नहीं कर सकता: न्यूयॉर्क टाइम्स
अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी नीति का परिणाम वॉशिंगटन की अपेक्षाओं के विपरीत हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव से ईरान के आत्मसमर्पण करने की संभावना जरूरी नहीं कि बढ़े। इसके बजाय, तेहरान क्षेत्रीय स्तर पर टकराव बढ़ाकर अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव डालने की कोशिश कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए एक नए अभियान की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने इस अभियान को “आर्थिक डी-डे” का नाम दिया है। इसका उद्देश्य ईरान के आर्थिक संसाधनों, व्यापारिक नेटवर्क और तेल से होने वाली आय को प्रभावित करना है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक दबाव जितना बढ़ेगा, ईरान के सामने अपनी प्रतिक्रिया को अधिक आक्रामक बनाने का प्रोत्साहन भी उतना ही बढ़ सकता है। तेहरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों और आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करता आया है और उसने इनके प्रभाव को कम करने के लिए वैकल्पिक व्यापारिक और वित्तीय रास्ते विकसित किए हैं।
आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति
रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच टकराव केवल सैन्य और राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा है। अब दोनों पक्षों के बीच आर्थिक दबाव और उसे झेलने की क्षमता भी संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने सोमवार को ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के उद्देश्य से नए उपायों की घोषणा की। हालांकि, इन उपायों को किस तरह और कितने व्यापक स्तर पर लागू किया जाएगा, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान की आर्थिक क्षमता को कमजोर करके तेहरान को अमेरिकी मांगों को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जा सकता है। लेकिन इस रणनीति की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को अपने साथ लाने में कितना सफल होता है।
विशेष रूप से चीन, रूस और तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि ये देश ईरान के साथ व्यापार और आर्थिक संबंध जारी रखते हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान के पास आर्थिक गतिविधियां जारी रखने के विकल्प बने रह सकते हैं।
ईरान की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है?
ईरान ने अमेरिकी आर्थिक दबाव को किसी अलग नीति के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यापक संघर्ष का हिस्सा बताया है जिसे वह अमेरिका और इज़राइल के साथ जारी टकराव के रूप में देखता है।
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने आर्थिक युद्ध को मौजूदा संघर्ष का एक प्रमुख मोर्चा बताया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि देश ने लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करने की तैयारी की है और नए आर्थिक दबावों से निपटने के लिए उसके पास योजनाएं मौजूद हैं।
रिपोर्ट में ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनीज़ादे के हवाले से कहा गया है कि तेहरान नए प्रतिबंधों के लिए तैयार है। ईरानी सरकार के पास आर्थिक दबाव से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना होने का भी दावा किया गया है।
इसका अर्थ यह है कि वॉशिंगटन जहां आर्थिक दबाव को ईरान को पीछे हटाने के साधन के रूप में देखता है, वहीं तेहरान इसे लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के रूप में देख सकता है।
खाड़ी देशों के लिए बढ़ सकता है खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे बड़ा जोखिम यह है कि यदि ईरान पर आर्थिक दबाव उसकी सीमा से बाहर आर्थिक नुकसान पैदा करने की क्षमता को प्रभावित करता है, तो तेहरान इसका जवाब क्षेत्रीय स्तर पर दे सकता है।
ईरानी अधिकारियों ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि फारस की खाड़ी के देश अमेरिकी अभियान में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं, तो उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से जुड़े अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि खाड़ी के देश ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रयासों में शामिल होते हैं, तो क्षेत्र से तेल के निर्यात को प्रभावित किया जा सकता है और ऐसे देशों को विरोधी माना जाएगा।
इन धमकियों को गंभीरता से लेने की वजह यह है कि फारस की खाड़ी और उसके आसपास का क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि यहां तेल उत्पादन या परिवहन बाधित होता है, तो उसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
आर्थिक दबाव से किसे सबसे ज्यादा नुकसान?
रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने यह भी सवाल उठाया है कि बढ़ते प्रतिबंधों का वास्तविक बोझ किस पर पड़ेगा।
आर्थिक प्रतिबंधों का उद्देश्य अक्सर सरकार की वित्तीय क्षमता और रणनीतिक फैसलों को प्रभावित करना होता है, लेकिन उनका असर आम नागरिकों पर भी पड़ सकता है। महंगाई, बेरोजगारी, मुद्रा की कमजोरी और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि जैसी समस्याएं आम आबादी को प्रभावित कर सकती हैं।
ऐसे में यह जरूरी नहीं कि आर्थिक संकट सीधे ईरानी नेतृत्व को अमेरिकी मांगें स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दे। इसके उलट, यदि ईरानी नेतृत्व यह मानता है कि अमेरिकी नीति का उद्देश्य उसके राजनीतिक अस्तित्व को कमजोर करना है, तो वह दबाव के सामने झुकने के बजाय टकराव बढ़ाने का रास्ता चुन सकता है।
क्या आर्थिक दबाव ईरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करेगा?
यही अमेरिकी नीति के सामने सबसे बड़ा सवाल है।
ईरान पिछले कई दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता रहा है। इस दौरान उसने प्रतिबंधों से बचने के लिए वैकल्पिक व्यापारिक नेटवर्क, ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का सहारा लिया है।
विशेषज्ञ सिना तौसी के अनुसार, यदि वॉशिंगटन ईरान के बचे हुए आर्थिक रास्तों को भी बंद करने की कोशिश करता है, तो तेहरान के लिए यह साबित करने की प्रेरणा बढ़ सकती है कि उसे अलग-थलग करने की कोशिश करने वाले देशों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
इस स्थिति में आर्थिक दबाव एक ऐसे चक्र को जन्म दे सकता है जिसमें अमेरिका प्रतिबंध बढ़ाए, ईरान उसका जवाब क्षेत्रीय दबाव या सैन्य कार्रवाई से दे और इसके बाद अमेरिका और उसके सहयोगी और कठोर कदम उठाएं।
अमेरिकी नीति के सामने विरोधाभास
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट जिस मुख्य विरोधाभास की ओर इशारा करती है, वह यही है कि अमेरिका आर्थिक दबाव का इस्तेमाल सैन्य संघर्ष को रोकने के लिए करना चाहता है, लेकिन अत्यधिक दबाव इसके उलट परिणाम भी दे सकता है।
वॉशिंगटन का लक्ष्य ईरान की आर्थिक क्षमता को कमजोर करके उसे अपनी नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर करना है। लेकिन यदि तेहरान यह निष्कर्ष निकालता है कि उसके पास आर्थिक और राजनीतिक रूप से खोने के लिए बहुत कम बचा है, तो वह समझौता करने के बजाय जोखिम भरा जवाब देने का फैसला कर सकता है।
ऐसे परिदृश्य में ईरान सीधे अमेरिका से टकराव करने के बजाय उसके क्षेत्रीय सहयोगियों, ऊर्जा आपूर्ति और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।
निष्कर्ष
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट का निष्कर्ष यह नहीं है कि आर्थिक प्रतिबंध ईरान की अर्थव्यवस्था को प्रभावित नहीं करेंगे। बल्कि सवाल यह है कि क्या आर्थिक नुकसान अपने आप ईरानी नेतृत्व को अमेरिकी मांगों के सामने झुकने के लिए मजबूर कर देगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है। ईरान के पास अमेरिकी प्रतिबंधों से निपटने का लंबा अनुभव है और चीन, रूस तथा अन्य देशों के साथ उसके आर्थिक संबंध उसके लिए कुछ विकल्प खुले रखते हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि आर्थिक दबाव बढ़ने के साथ ईरान अपनी प्रतिक्रिया को अपनी सीमाओं से बाहर ले जाने की कोशिश कर सकता है। ऐसी स्थिति में आर्थिक युद्ध का असर तेल बाजार, फारस की खाड़ी और पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
इसलिए अमेरिकी रणनीति के सामने चुनौती केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि आर्थिक दबाव ऐसा मोड़ न ले, जिससे वह व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का कारण बन जाए।


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