सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई के समर्थन में पूरा ईरान सड़कों पर उतरा
हाल के आतंकी हमले के बाद ईरान में जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि वर्षों से निर्मित राजनीतिक, वैचारिक और सामाजिक एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन था। तेहरान से लेकर मशहद, क़ुम, इस्फ़हान और तबरीज़ तक लाखों लोग सड़कों पर उतरे। इन जनसभाओं और रैलियों में जो सबसे प्रमुख स्वर उभरा, वह था सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के प्रति समर्थन और आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट प्रतिरोध। ईरानी जनता के इस प्रदर्शन को केवल “सरकारी आयोजन” कहकर खारिज करना वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा। ईरान का राजनीतिक ढांचा विशिष्ट है, जहां धार्मिक नेतृत्व, राष्ट्रीय संप्रभुता और ऐतिहासिक स्मृति आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। अयातुल्लाह ख़ामेनेई केवल एक राजनीतिक पदाधिकारी नहीं, बल्कि 1979 की इस्लामी क्रांति की वैचारिक निरंतरता के प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि संकट की घड़ी में उनका समर्थन केवल सत्ता के प्रति नहीं, बल्कि उस क्रांतिकारी पहचान के प्रति निष्ठा का भी संकेत देता है।
ख़ामेनेई की लोकप्रियता के सामाजिक आधार
अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की लोकप्रियता को समझने के लिए ईरानी समाज की संरचना को देखना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों, धार्मिक वर्गों, युद्ध-पीढ़ी और उन परिवारों में जिन्होंने ईरान-इराक युद्ध का दर्द झेला, वहां सुप्रीम लीडर को राष्ट्रीय प्रतिरोध के संरक्षक के रूप में देखा जाता है। उनके भाषणों में बार-बार आत्मनिर्भरता, विदेशी हस्तक्षेप के विरोध और सांस्कृतिक स्वायत्तता पर ज़ोर दिया जाता है, जो एक लंबे समय से प्रतिबंधों और दबावों से जूझ रहे समाज में गहरी प्रतिध्वनि पैदा करता है। ईरानी जनता के लिए ख़ामेनेई का नेतृत्व केवल आज की राजनीति तक सीमित नहीं है। यह औपनिवेशिक हस्तक्षेप, 1953 के तख्तापलट, पश्चिमी समर्थन प्राप्त शाह के शासन और बाद में लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों की स्मृति से जुड़ा हुआ है। इस ऐतिहासिक संदर्भ में सुप्रीम लीडर को वह व्यक्ति माना जाता है जिसने ईरान को बाहरी दबावों के बावजूद अपने पैरों पर खड़ा रखने की कोशिश की।
आतंकवाद और राष्ट्रीय एकता
हालिया आतंकी हमला ईरान के लिए केवल सुरक्षा चुनौती नहीं था, बल्कि उसकी संप्रभुता पर सीधा आघात माना गया। रैलियों में बार-बार यह बात सामने आई कि आतंकवाद को केवल हिंसक कृत्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक उपकरण के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य देश को भीतर से अस्थिर करना है। इसी संदर्भ में जनता ने सुप्रीम लीडर के पीछे खड़े होकर यह संदेश दिया कि ईरान की आंतरिक एकता को बाहरी ताकतें तोड़ नहीं सकतीं। इन प्रदर्शनों में युवाओं, महिलाओं और बुज़ुर्गों की भागीदारी यह दर्शाती है कि यह प्रतिक्रिया किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं थी। नारे, पोस्टर और भाषणों में बार-बार “ईरान की गरिमा”, “राष्ट्रीय स्वतंत्रता” और “नेतृत्व के प्रति निष्ठा” जैसे शब्द उभर कर आए।
ट्रंप युग की अमेरिकी नीतियों की आलोचना
ईरान-अमेरिका संबंधों में डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल विशेष रूप से तनावपूर्ण रहा। परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका का एकतरफा हटना ईरान में व्यापक रूप से विश्वासघात के रूप में देखा गया। इस निर्णय ने न केवल ईरानी अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला, बल्कि उन मध्यमार्गी आवाज़ों को भी कमजोर किया जो पश्चिम के साथ संवाद की वकालत कर रही थीं। ईरानी दृष्टिकोण से ट्रंप प्रशासन की “अधिकतम दबाव” नीति एक सामूहिक दंड जैसी थी, जिसका असर आम नागरिकों पर पड़ा। दवाइयों, आवश्यक वस्तुओं और वित्तीय लेन-देन पर पड़े अप्रत्यक्ष प्रभावों ने यह धारणा मजबूत की कि अमेरिका की नीति ईरानी शासन को नहीं, बल्कि ईरानी समाज को निशाना बना रही है। इसी कारण, विडंबना यह रही कि बाहरी दबाव ने आंतरिक असहमति को कम करने और नेतृत्व के चारों ओर समर्थन को मजबूत करने का काम किया।
इज़रायल और मोसाद पर आरोपों का संदर्भ
ईरान में लंबे समय से यह विश्वास रहा है कि इज़रायल और उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद क्षेत्रीय अस्थिरता में भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों की हत्याएं, साइबर हमले और गुप्त अभियानों के आरोप ईरानी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन दावों पर मतभेद हैं, लेकिन ईरानी समाज में इन्हें वास्तविक और गंभीर खतरे के रूप में देखा जाता है।मोसाद के संदर्भ में ईरानी मीडिया और नेतृत्व का तर्क यह है कि इस प्रकार की गतिविधियां न केवल ईरान की सुरक्षा को चुनौती देती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करती हैं। यही कारण है कि आतंकी घटनाओं के बाद इज़रायल-विरोधी भावनाएं और अधिक तीव्र हो जाती हैं, और सुप्रीम लीडर का कठोर रुख जनता के एक बड़े हिस्से को उचित प्रतीत होता है।
ख़ामेनेई और “प्रतिरोध की धुरी”
अयातुल्लाह ख़ामेनेई की लोकप्रियता का एक और पहलू उनकी क्षेत्रीय नीति से जुड़ा है, जिसे ईरान में “प्रतिरोध की धुरी” कहा जाता है। लेबनान, फ़िलिस्तीन और अन्य क्षेत्रों में पश्चिमी और इज़रायली प्रभाव के विरोध को ईरानी नेतृत्व नैतिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से सही ठहराता है। समर्थकों के अनुसार, यह नीति ईरान को केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि उत्पीड़न के विरुद्ध खड़े होने वाले प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है। यही सोच ईरानी सड़कों पर दिखे प्रदर्शनों में भी झलकती है, जहां ख़ामेनेई को केवल देश के नेता के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक अन्याय के विरुद्ध आवाज़ के रूप में चित्रित किया गया।
ईरान में हालिया घटनाओं के बाद सड़कों पर उतरी जनता को समझने के लिए सरल निष्कर्ष पर्याप्त नहीं हैं। यह समर्थन भय, दबाव या केवल प्रचार का परिणाम नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान, संप्रभुता और लगातार बाहरी हस्तक्षेप की अनुभूति से उपजा हुआ है। अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की लोकप्रियता इसी जटिल सामाजिक-राजनीतिक संरचना में निहित है। ट्रंप युग की अमेरिकी नीतियां और इज़रायल व मोसाद को लेकर ईरानी दृष्टिकोण इस समर्थन को और मजबूत करते हैं, क्योंकि वे “बाहरी दुश्मन” की धारणा को पुष्ट करते हैं। चाहे अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन दावों से सहमत हो या नहीं, यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ईरान की एक बड़ी आबादी अपने सुप्रीम लीडर को राष्ट्रीय सम्मान और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में देखती है।और हाँ, राजनीति हमेशा इतनी सीधी नहीं होती। लेकिन अगर कुछ साफ़ दिखता है, तो वह यह कि संकट के क्षणों में ईरानी समाज अब भी अपने नेतृत्व के चारों ओर इकट्ठा होने की क्षमता रखता है।


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