अमेरिका का विवादित युद्धपोत आखिरकार स्वदेश लौटा, मिशन पर उठे बड़े सवाल
अमेरिकी विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford, जिसे अमेरिका अपनी नौसैनिक ताकत का सबसे आधुनिक प्रतीक बताता है, 326 दिनों तक लगातार सैन्य अभियानों में तैनात रहने के बाद आखिरकार वर्जीनिया के Norfolk बंदरगाह पर लौट आया।
यह तैनाती इतनी लंबी रही कि इसे वियतनाम युद्ध के बाद किसी भी अमेरिकी विमानवाहक पोत की सबसे लंबी परिचालन तैनाती माना जा रहा है।
अमेरिकी मीडिया और सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, इस मिशन के दौरान जेराल्ड फोर्ड को पश्चिम एशिया और अटलांटिक क्षेत्र में कई संवेदनशील अभियानों में लगाया गया, जिनमें ईरान पर दबाव बढ़ाने और वेनेज़ुएला के खिलाफ अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन जैसे अभियान भी शामिल थे। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इतनी लंबी तैनाती के बावजूद अमेरिका अपने रणनीतिक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका।
ईरान समर्थक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी नौसेना की यह लंबी तैनाती वॉशिंगटन की बढ़ती बेचैनी और क्षेत्र में घटते प्रभाव को दर्शाती है। उनका दावा है कि ईरान और उसके सहयोगी समूहों के बढ़ते दबाव के कारण अमेरिका को लगातार अपने सबसे बड़े युद्धपोतों को क्षेत्र में बनाए रखना पड़ा।
इस दौरान युद्धपोत को कई गंभीर तकनीकी और आंतरिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। रिपोर्टों में जहाज पर आग लगने, सीवेज सिस्टम की बार-बार खराबी, उपकरणों के फेल होने और लंबे समय तक घर से दूर रहने के कारण चालक दल में असंतोष की बातें सामने आईं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि कई सैनिक मानसिक दबाव और थकान से जूझ रहे थे।
जेराल्ड फोर्ड पहले से ही अमेरिकी रक्षा बजट का सबसे महंगा युद्धपोत माना जाता है। इसकी निर्माण लागत 13 अरब डॉलर से अधिक बताई जाती है, जबकि इसके निर्माण और तैनाती में वर्षों की देरी भी हुई। सबसे ज्यादा आलोचना इसके “Advanced Weapons Elevators (AWE)” सिस्टम को लेकर हुई, जो आधुनिक चुंबकीय तकनीक से हथियारों और बमों को निचले डेक से उड़ान डेक तक पहुंचाने के लिए बनाया गया था।
लेकिन यह प्रणाली लंबे समय तक सही ढंग से काम नहीं कर सकी, जिसके कारण अमेरिकी नौसेना को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा। विरोधियों और आलोचकों ने इसे “13 अरब डॉलर का बेकार लोहे का ढांचा” तक कह दिया।
ईरान समर्थक हलकों में इस वापसी को अमेरिकी सैन्य शक्ति की कमजोरी और अत्यधिक खर्चीली युद्धनीति की विफलता के रूप में पेश किया जा रहा है। उनका कहना है कि अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद अमेरिका क्षेत्र में स्थायी दबदबा कायम नहीं कर पाया, जबकि ईरान अब भी पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है।


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