दुश्मनों के किसी भी संभावित आक्रामण का पहले से अधिक कड़ा जवाब दिया जाएगा: आईआरजीसी

दुश्मनों के किसी भी संभावित आक्रामण का पहले से अधिक कड़ा जवाब दिया जाएगा: आईआरजीसी

मरसाद अभियान की वर्षगांठ के अवसर पर ईरानी सेना ने अपने बयान में कहा कि ईरानी कैलेंडर वर्ष के अनुसार, 5 मोरदाद (5 अगस्त) ईरान की रक्षा में देश के वीर सपूतों के अदम्य साहस और बलिदान का स्वर्णिम अध्याय है।

सेना ने कहा कि सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर के निर्देशों का पालन करते हुए, वह अन्य सशस्त्र बलों के साथ पहले से अधिक सतर्क और पूरी तरह तैयार है। देश के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धमकी या साज़िश का डटकर सामना किया जाएगा तथा इस्लामी मातृभूमि की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। बयान में यह भी कहा गया कि यदि दुश्मन कोई आक्रामक कार्रवाई करता है, तो उसे पहले से अधिक कठोर और निर्णायक जवाब दिया जाएगा।

मरसाद अभियान ने गद्दारों को ऐसा सबक सिखाया कि वे दोबारा किसी भी प्रकार के आक्रमण की हिम्मत न करें

आईआरजीसी ने मरसाद अभियान की वर्षगांठ पर जारी अपने बयान में कहा कि 5 मोरदाद 1367 (27 जुलाई 1988) को ईरानी जनता ने “मुनाफ़िक़ीन” (मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ संगठन) को पूरी तरह पराजित कर देश और राष्ट्र के गद्दारों को ऐसा सबक सिखाया, जिससे वे भविष्य में किसी भी प्रकार के हमले का विचार भी न कर सकें।

बयान में कहा गया कि यह संगठन हमेशा ईरान के दुश्मनों का सहयोगी और उनका “पाँचवाँ स्तंभ” (फ़िफ्थ कॉलम) बनकर काम करता रहा है तथा उसने देश के विरुद्ध किसी भी प्रकार की गद्दारी से परहेज़ नहीं किया। हाल के वर्षों की अशांति और कथित असफल तख्तापलट की साज़िश में भी इसकी प्रभावशाली भूमिका रही।

आईआरजीसी के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में इस्लामी क्रांति के विरोधी ईरानी जनता को झुकाने के लिए अपनी सभी क्षमताओं का उपयोग कर रहे हैं, जिनमें यह संगठन भी शामिल है।

बयान के अंत में कहा गया कि ईरानी जनता की सतर्कता, दूरदर्शिता और राष्ट्रीय एकता ही देश की शक्ति और मजबूती को बनाए रखेगी तथा विरोधी और षड्यंत्रकारी शक्तियों की सभी योजनाओं को विफल कर देगी।

मरसाद अभियान (ऑपरेशन मरसाद) क्या था?

मरसाद अभियान (ऑपरेशन मरसाद) ईरान-इराक़ युद्ध के अंतिम दिनों में जुलाई 1988 में चलाया गया एक बड़ा सैन्य अभियान था।

इसकी शुरुआत तब हुई जब मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ संगठन (MEK/MKO), जिसे ईरानी सरकार “मुनाफ़िक़ीन” कहती है, इराक़ के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के समर्थन से पश्चिमी सीमा से ईरान में घुस आया। इस संगठन ने अपनी कार्रवाई को “फ़ोरूग़-ए-जावेदान” (Eternal Light) नाम दिया था और उसका उद्देश्य तेहरान की ओर बढ़ना था।

इसके जवाब में ईरानी सेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने संयुक्त रूप से जवाबी अभियान चलाया, जिसे “ऑपरेशन मरसाद” नाम दिया गया। “मरसाद” का अर्थ है “घात” या “घात लगाकर हमला करना”।

इस अभियान के दौरान ईरानी बलों ने पश्चिमी ईरान के किरमानशाह प्रांत के आसपास MEK के काफिलों को रोककर उन पर हमला किया। कुछ ही दिनों में उनकी अग्रिम बढ़त रोक दी गई और उन्हें भारी नुक़सान उठाते हुए पीछे हटना पड़ा।

ईरान में इस अभियान को एक महत्वपूर्ण सैन्य विजय माना जाता है और हर वर्ष 5 मोरदाद (लगभग 27 जुलाई) को इसकी वर्षगांठ पर सेना और आईआरजीसी विशेष कार्यक्रम आयोजित करते हैं। दूसरी ओर, इस घटना के बारे में MEK और कुछ अन्य स्रोत अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, इसलिए इसके राजनीतिक और ऐतिहासिक मूल्यांकन पर मतभेद भी मौजूद हैं।

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