सवाल यह नहीं है कि, ईरान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे कब होंगे: अमेरिकी रक्षामंत्री

सवाल यह नहीं है कि, ईरान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे कब होंगे: अमेरिकी रक्षामंत्री

अमेरिका के रक्षामंत्री Pete Hegseth ने CBS से बातचीत में कहा:

“हम ईरान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अब सवाल यह नहीं है कि समझौते पर हस्ताक्षर होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे कब होंगे। “मुझे उम्मीद नहीं है कि बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर इज़राइल के हमले ईरान के साथ होने वाले समझौते में बाधा डालेंगे।”

“यदि ईरान चाहता है कि यह प्रक्रिया कायम रहे, तो उसे हिज़्बुल्लाह पर नियंत्रण रखना होगा।”मुझे उम्मीद है कि आगे और अधिक उन्नत स्तर की वार्ताएँ होंगी, और मेरा मानना है कि ये बातचीत जारी रहेगी।”

अमेरिकी रक्षामंत्री पीट हेगसेथ का यह बयान एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि वॉशिंगटन क्षेत्रीय राजनीति को अपने हितों के अनुसार संचालित करना चाहता है। एक ओर अमेरिका ईरान के साथ समझौते की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह इस समझौते को ऐसी शर्तों से जोड़ रहा है जो सीधे तौर पर ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों पर दबाव डालने का प्रयास हैं।

हेगसेथ का यह कहना कि ईरान को हिज़्बुल्लाह को “नियंत्रित” करना चाहिए, इस बात का संकेत है कि अमेरिका केवल परमाणु या सुरक्षा संबंधी मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को भी अपने पक्ष में ढालना चाहता है। आलोचकों का मानना है कि यह संप्रभु देशों और क्षेत्रीय आंदोलनों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का एक और उदाहरण है।

इसी बीच, इज़रायल द्वारा बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर किए गए हमले भी गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। ऐसे समय में जब क्षेत्र में तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान खोजने की बात हो रही है, इज़रायल की सैन्य कार्रवाइयाँ शांति प्रयासों को कमजोर करती दिखाई देती हैं। इसके बावजूद अमेरिकी प्रशासन का यह कहना कि ये हमले समझौते की राह में बाधा नहीं बनेंगे, दोहरे मानदंडों की ओर इशारा करता है। यदि किसी अन्य देश द्वारा ऐसी कार्रवाई की जाती, तो संभवतः अमेरिका उसकी कड़ी निंदा करता।

कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इज़रायल लंबे समय से “दबाव और बातचीत” की समानांतर नीति अपनाते रहे हैं—एक तरफ वार्ता की बात और दूसरी तरफ सैन्य तथा राजनीतिक दबाव। इस कारण क्षेत्र के लोगों में यह धारणा मजबूत हुई है कि शांति और स्थिरता की वास्तविक चिंता से अधिक महत्व रणनीतिक हितों और शक्ति-प्रदर्शन को दिया जा रहा है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या प्रस्तावित समझौता वास्तव में क्षेत्र में स्थायी शांति लाने के लिए है, या फिर यह अमेरिका और इज़राइल की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का एक हिस्सा मात्र है।

popular post

सवाल यह नहीं है कि, ईरान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे कब होंगे: अमेरिकी रक्षामंत्री

सवाल यह नहीं है कि, ईरान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर होंगे या नहीं, बल्कि

संयुक्त अरब अमीरात ने इस्राईली नागरिकों को वीज़ा देना किया शुरू

कुछ दिनों पहले इस्राईल के साथ अपने संबंधों को सार्वजनिक कर कई समझौते पर हस्ताक्षर

4 दिसंबर भारतीय नौसेना दिवस

4 दिसंबर भारतीय नौसेना दिवस हर देश किसी न किसी तारीख़ को नौसेना दिवस मनाया

कल से शुरू होगी टी-20 सीरीज, जानिए कितने बजे खेला जाएगा मैच

भारतीय टीम फ़िलहाल अपने ऑस्टेलिया के दौरे पर है जहाँ पर अब तक एकदिवसीय सीरीज़

कुछ हफ़्तों में मेड इन इंडिया कोरोना वैक्सीन आने की उम्मीद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

कोरोना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह एक सर्वदलीय बैठक की. पीएम मोदी ने

महाराष्ट्र में बीजेपी को विधान परिषद चुनाव में लगा तगड़ा झटका, सिर्फ एक सीट पर मिल सकी जीत

महाराष्ट्र में बीजेपी को विधान परिषद चुनाव में तगड़ा झटका लगा है. विधान परिषद की

5वें दौर की बैठक: किसानों का दो टूक जवाब हम सरकार से चर्चा नहीं, बल्कि ठोस जवाब चाहते हैं वो भी लिखित में,

कृषि कानूनों को लेकर पिछले 9 दिनों से धरने पर बैठे किसानों के साथ केंद्र

रूस की नसीहत, वेस्ट बैंक में एकपक्षीय कार्रवाई से बचे इस्राईल

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने मेडिटरेनीयन डायलॉग्स बैठक को संबोधित करते हुए कहा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *