ट्रंप की ईरान नीति, बेतुकी बयानबाज़ी में क्यों बदल गई??
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया विरोधाभासी बयान उनके आकलनों और ईरान की वास्तविकता के बीच गहरे अंतर को उजागर करते हैं। जो कुछ वह अब अनजाने में स्वीकार कर रहे हैं, वह दरअसल ईरान की संस्कृति को समझने में उनकी दो बुनियादी रणनीतिक गलतियों के टूटने का परिणाम है।
पहली गलती: सत्ता संरचना व्यक्तियों पर आधारित नहीं है
ट्रंप का मानना था कि नेताओं और अधिकारियों को शारीरिक रूप से हटाने से ईरान की व्यवस्था तीन दिनों में ढह जाएगी। लेकिन वह इस मूल तथ्य को समझ नहीं पाए कि पिछले 47 वर्षों में बना यह तंत्र संस्थाओं और जन-आस्थाओं पर आधारित है, किसी एक व्यक्ति पर नहीं।
मैदानी अनुभव से साबित हुआ कि जैसे ही किसी अधिकारी या कमांडर को निशाना बनाया जाता है, तुरंत कई प्रेरित लोग उसकी जगह ले लेते हैं, बिना देश के कामकाज या रक्षात्मक अभियानों में कोई रुकावट आए। यह ढांचा आसानी से कमजोर नहीं किया जा सकता।
दूसरी गलती: जनता को व्यवस्था से अलग समझना
ट्रंप व्यापक मनोवैज्ञानिक प्रचार से प्रभावित होकर यह मान बैठे कि वह जनता और शासन के बीच दूरी पैदा कर सकते हैं। इसी भ्रम में उन्होंने तीन दिनों में ईरान का मामला खत्म करने की बात कही थी।
लेकिन वास्तविकता इसके उलट निकली। आज वह देख रहे हैं कि ईरान की जनता न केवल व्यवस्था से अलग नहीं हुई है, बल्कि पहले से ज्यादा जोश के साथ मैदान में मौजूद है और दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। यह एकता इतनी गहरी है कि उन्होंने हाल ही में अपने एक और भ्रामक बयान में अनजाने में स्वीकार किया कि ईरान की जनता बातचीत के खिलाफ है, और इसी वजह से वहां के अधिकारी बातचीत की बात सार्वजनिक करने से हिचकते हैं।
आज ट्रंप के बयानों में दिखने वाला विरोधाभास—कभी जनता के समर्थन का दावा, तो कभी अमेरिका के प्रति नकारात्मक भावनाओं की स्वीकारोक्ति—दरअसल उनकी इन दो रणनीतिक गलतियों के हकीकत से टकराने का नतीजा है। ईरान की व्यवस्था, जो न व्यक्तियों पर निर्भर है और न ही जनता से अलग, उनके सभी आकलनों को गलत साबित कर चुकी है और उन्हें असंगत बयान देने पर मजबूर कर रही है।


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