अमेरिकी-इज़रायली हमलों ने ईरानियों की देशभक्ति को और मज़बूत कर दिया: पश्चिमी मीडिया

अमेरिकी-इज़रायली हमलों ने ईरानियों की देशभक्ति को और मज़बूत कर दिया: पश्चिमी मीडिया

इज़रायल और उसके कट्टर सहयोगी और स्थायी साथी, अमेरिका यह सोचकर ईरान पर हमला करने की योजना बना रहे थे कि इससे ईरान में अराजकता फैल जाएगी। लेकिन यह युद्ध न केवल ईरान के विघटन में असफल रहा, बल्कि पश्चिमी मीडिया की मानें तो इसने ईरानियों की देशभक्ति को और मज़बूत कर दिया।

ब्रिटेन के अख़बार गार्डियन ने स्वीकार किया है कि, इज़रायल का 12 दिन का युद्ध ईरान के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ा गया। इस अख़बार ने ज़ोर देकर कहा कि, बाहरी हमले के सामने ईरानी लोग और भी अधिक एकजुट हो गए और उनकी देशभक्ति और गहरी हो गई।

23 जून को, जब तेहरान और वाशिंगटन के बीच बातचीत चल रही थी और छठे दौर की शुरुआत होने ही वाली थी, उस समय ज़ायोनी शासन ने ईरान की ज़मीन पर सीधा हमला किया, जिसमें 1000 से अधिक ईरानी शहीद हुए। इनमें कई वरिष्ठ कमांडर और कम से कम 17 परमाणु वैज्ञानिक भी शामिल थे।

गार्डियन ने समाजशास्त्रियों और ईरानी नागरिकों से की गई बातचीत के हवाले से लिखा कि, अब “ईरान” का मुद्दा, और ख़ास तौर पर ईरान की पहचान, भूगोल और इतिहास, ईरानियों की अधिकतर चर्चाओं का केंद्र बन चुका है। लोग एक-दूसरे को यह याद दिलाना चाहते हैं कि, वे ईरानी हैं।

राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है — सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल में ईरानी झंडे का इस्तेमाल, ईरान के इतिहास पर पॉडकास्ट बनाना और इस तरह की अन्य गतिविधियाँ अब पश्चिमी मीडिया की नज़र में हैं। गार्डियन ने लिखा कि ईरानी लोग खुलकर “ईरान” की बात कर रहे हैं।

अख़बार ने एक ईरानी नागरिक के हवाले से लिखा कि — “अगर युद्ध फिर शुरू हो, तो हम तैयार हैं। ईरानियों के दिल में कुछ गहरा है: हम हार नहीं मानेंगे और अपमानित नहीं होंगे।”

यह पहली बार नहीं है कि पश्चिमी मीडिया ने ईरानियों की एकता की ओर इशारा किया हो। इससे पहले फॉरेन अफ़ेयर्स और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अमेरिकी मीडिया ने भी कहा था कि, इस युद्ध ने ईरानियों के बीच राष्ट्रीय एकजुटता को और मज़बूत किया।

इज़रायली अधिकारियों ने युद्ध के दौरान स्वीकार किया था कि उन्होंने यह हमला इसलिए किया था ताकि, ईरान में सड़क पर विरोध-प्रदर्शन हों और देश अराजकता में डूब जाए। लेकिन ईरानी जनता ने एक बार फिर दुश्मनों की साज़िश को नाकाम कर दिया और पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूती के साथ अपने देश के पीछे खड़ी हो गई। हाँ, लोग सड़कों पर उतरे — लेकिन नेतन्याहू के ख़िलाफ़।

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