ईरानी जनता ने साबित किया, अली ख़ामेनेई से बड़ा उनका कोई लीडर नहीं
इस्लामी क्रांति की 47 वीं वर्षगाँठ पर ट्रंप की हमले की धमकियों को दरकिनार कर पूरा ईरान अपने लोकप्रिय और सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई के समर्थन में सड़क पर उतर आया। पूरा ईरान “मर्ग बर अमेरिका” मर्ग बर इस्राइल (अमेरिका मुर्दाबाद, इज़रायल मुर्दाबाद ) के नारो से गूँज उठा। ईरानी जनता की अपार भीड़ ने साबित कर दिया कि, वह अपने सुप्रीम लीडर के साथ खड़े हैं। किसी भी परिस्थिति में वह अपने सुप्रीम लीडर का साथ नहीं छोड़ेंगे। यह एक चेतावनी है ट्रंप और नेतन्याहू के लिए जो ईरान में रजीम चेंज(तख़्ता पलट) करने का ख़्वाब देख रहे हैं।
तेहरान की सड़कों पर उमड़ा सैलाब सिर्फ़ एक जश्न नहीं था, वह एक राजनीतिक बयान था। इस्लामी क्रांति की 47वीं वर्षगांठ ऐसे समय आई जब अमेरिका की ओर से फिर से कड़े तेवर दिखाए जा रहे थे और इज़रायल लगातार ईरान के खिलाफ़ चेतावनी भरे बयान दे रहा था। इन परिस्थितियों में लाखों ईरानियों का सड़कों पर उतरना एक साधारण घटना नहीं माना जा सकता।
भीड़ के नारों में अमेरिका और इज़रायल की नीतियों के प्रति तीखा विरोध झलक रहा था। यह विरोध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही भू-राजनीतिक खींचतान का परिणाम है। ईरानी जनता ने इस मौके पर यह जताने की कोशिश की कि बाहरी दबाव से उनका राजनीतिक ढांचा कमजोर नहीं पड़ेगा और वे अपने सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई के साथ खड़े हैं।
“मैक्सिमम प्रेशर” बनाम “मैक्सिमम रेज़िस्टेंस”
अमेरिका ने पिछले वर्षों में ईरान के खिलाफ़ जिस “मैक्सिमम प्रेशर” नीति को अपनाया, उसका उद्देश्य आर्थिक प्रतिबंधों के ज़रिए ईरान को झुकाना था। बैंकिंग सिस्टम पर रोक, तेल निर्यात पर प्रतिबंध, विदेशी कंपनियों पर दबाव, और कूटनीतिक अलगाव की कोशिशें इसी रणनीति का हिस्सा थीं। लेकिन ईरान ने इसका जवाब “मैक्सिमम रेज़िस्टेंस” के रूप में दिया। यानी, झुकने के बजाय टिके रहना। यही संदेश इस वर्षगांठ की रैलियों में भी देखने को मिला। जनता की बड़ी मौजूदगी को सरकार ने इस नीति की वैधता के प्रमाण के रूप में पेश किया।
ईरान का तर्क साफ़ है: प्रतिबंधों से सरकारें नहीं, आम लोग प्रभावित होते हैं। दवाइयों की कमी, महंगाई, मुद्रा का गिरना, बेरोज़गारी—इन सबका बोझ जनता उठाती है। ऐसे में प्रतिबंधों को नैतिक हथियार कहना कठिन हो जाता है।
जनता की मौजूदगी हर बम और मिसाइल से ज़्यादा ताकतवर है: ईरानी रक्षा मंत्री
अमीर नसीरज़ादे ने कहा: ईरान की जनता जागरूक और समझदार है। वे अच्छी तरह जानती है कि दुनिया में क्या घटनाएँ घट रही हैं। लोग पूरी समझ और जागरूकता के साथ इस रैली में शामिल हुए हैं, और उनकी यह मौजूदगी किसी भी बम या मिसाइल से अधिक शक्तिशाली है।
इज़रायल के साथ टकराव का संदर्भ
इज़रायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है। उसने कई बार कहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने नहीं देगा। ईरान लगातार कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। मुद्दा केवल परमाणु कार्यक्रम का नहीं है। सीरिया, लेबनान और ग़ज़ा में प्रभाव की राजनीति भी इस टकराव का हिस्सा है। इज़रायल क्षेत्रीय संतुलन को अपने सुरक्षा नजरिए से देखता है, जबकि ईरान खुद को प्रतिरोध की धुरी का हिस्सा बताता है।
47वीं वर्षगांठ पर लगे नारों में इस व्यापक संघर्ष की गूंज सुनाई दी। यह केवल एक देश के खिलाफ़ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि दशकों से चले आ रहे वैचारिक और सामरिक संघर्ष की अभिव्यक्ति थी।
अली ख़ामेनेई की भूमिका
अली ख़ामेनेई 1989 से ईरान के सुप्रीम लीडर हैं। इतने लंबे समय तक नेतृत्व में बने रहना किसी भी राजनीतिक व्यवस्था के लिए स्थिरता का संकेत होता है। उनके समर्थक उन्हें राष्ट्रीय संप्रभुता और इस्लामी क्रांति के सिद्धांतों का संरक्षक मानते हैं।वर्षगांठ के मौके पर सड़कों पर उतरी भीड़ ने यह दिखाने की कोशिश की कि बाहरी दबाव के समय नेतृत्व का प्रतीक और भी मजबूत हो जाता है। जब देश को लगता है कि उसे घेरा जा रहा है, तब आंतरिक एकजुटता बढ़ती है।
जनता की मौजूदगी हर बम और मिसाइल से ज़्यादा ताकतवर है: ईरानी रक्षा मंत्री
ईरान के रक्षा मंत्री अमीर नसीरज़ादे का बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि “जनता की मौजूदगी हर बम और मिसाइल से ज़्यादा ताकतवर है।” यह कथन केवल सैन्य तुलना नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश था—कि वैधता की ताकत किसी भी सैन्य धमकी से बड़ी होती है।
“रजीम चेंज” की बहस
ईरान में व्यापक धारणा है कि अमेरिका और इज़रायल वहां सत्ता परिवर्तन की इच्छा रखते हैं। पश्चिमी देशों द्वारा मानवाधिकार मुद्दों पर आलोचना, विपक्षी समूहों के समर्थन और कड़े प्रतिबंधों को इसी नजरिए से देखा जाता है।
हालांकि अमेरिका आधिकारिक तौर पर लोकतंत्र और क्षेत्रीय स्थिरता की बात करता है, लेकिन इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां सत्ता परिवर्तन की रणनीतियाँ अपनाई गईं। इस पृष्ठभूमि में ईरान की आशंका को पूरी तरह खारिज करना भी सरल नहीं है। वर्षगांठ की रैली ने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया। भीड़ का संदेश था कि बाहरी ताकतें चाहे जितना दबाव डालें, देश के भीतर राजनीतिक ढांचा अचानक नहीं टूटेगा।
प्रतिबंधों का नैतिक प्रश्न
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आर्थिक प्रतिबंध वास्तव में राजनीतिक बदलाव लाते हैं? या वे केवल आम जनता की कठिनाइयाँ बढ़ाते हैं?
ईरान के मामले में प्रतिबंधों ने अर्थव्यवस्था को झटका जरूर दिया है, लेकिन सत्ता संरचना कायम है। इससे यह तर्क मजबूत होता है कि प्रतिबंध अक्सर अपने घोषित उद्देश्य हासिल नहीं कर पाते। जब किसी देश की जनता सड़कों पर उतरकर यह दिखाती है कि वह अपने नेतृत्व के साथ खड़ी है, तो यह प्रतिबंध नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलता
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच का संघर्ष केवल तीन देशों की कहानी नहीं है। इसमें क्षेत्रीय संतुलन, ऊर्जा राजनीति, सैन्य गठबंधन और वैचारिक मतभेद सब शामिल हैं। अमेरिका खुद को वैश्विक व्यवस्था का संरक्षक मानता है। इज़रायल अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि रखता है। ईरान खुद को स्वतंत्र और बाहरी दबाव के खिलाफ़ खड़े राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है। इन तीनों दृष्टिकोणों का टकराव स्वाभाविक है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह टकराव अंतहीन रहेगा? या कभी संवाद की गुंजाइश बनेगी?
जनता का संदेश
तेहरान की सड़कों पर खड़े लोगों ने कम से कम उस दिन यह दिखाया कि वे अपने देश की संप्रभुता के सवाल पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं। चाहे यह समर्थन वैचारिक हो, भावनात्मक हो या राजनीतिक—उसकी उपस्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह भी सच है कि किसी भी देश में मतभेद होते हैं। हर नागरिक एक जैसी सोच नहीं रखता। लेकिन 46वीं वर्षगांठ पर जो तस्वीर सामने आई, वह एकजुटता की थी।
इस्लामी क्रांति की 46वीं वर्षगांठ पर ईरान ने यह संकेत दिया कि बाहरी दबाव, प्रतिबंध और धमकियाँ उसके राजनीतिक ढांचे को तुरंत नहीं बदल सकतीं। अमेरिका और इज़रायल की नीतियों की आलोचना रैलियों में खुलकर हुई, और नेतृत्व के प्रति समर्थन का प्रदर्शन भी हुआ। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति का खेल चलता रहेगा। बयानबाज़ी भी होगी, रणनीतियाँ भी बनेंगी। लेकिन किसी भी देश की असली ताकत उसकी जनता होती है।
तेहरान की सड़कों पर उमड़ी भीड़ ने यही दावा किया—कि वे अपने नेतृत्व के साथ खड़े हैं और बाहरी दबाव के सामने झुकने के मूड में नहीं हैं। राजनीति शोर से भरी हो सकती है, लेकिन अंततः इतिहास यह देखता है कि संकट के समय कौन अपने को कितना संगठित रख पाया। 46वीं वर्षगांठ पर ईरान ने दुनिया को यही तस्वीर दिखाने की कोशिश की।


popular post
हिमंता बिस्व सरमा एक दिन भी अपनी कुर्सी पर बने रहने के योग्य नहीं: बदरुद्दीन अजमल
हिमंता बिस्व सरमा एक दिन भी अपनी कुर्सी पर बने रहने के योग्य नहीं: बदरुद्दीन
संयुक्त अरब अमीरात ने इस्राईली नागरिकों को वीज़ा देना किया शुरू
कुछ दिनों पहले इस्राईल के साथ अपने संबंधों को सार्वजनिक कर कई समझौते पर हस्ताक्षर
4 दिसंबर भारतीय नौसेना दिवस
4 दिसंबर भारतीय नौसेना दिवस हर देश किसी न किसी तारीख़ को नौसेना दिवस मनाया
कल से शुरू होगी टी-20 सीरीज, जानिए कितने बजे खेला जाएगा मैच
भारतीय टीम फ़िलहाल अपने ऑस्टेलिया के दौरे पर है जहाँ पर अब तक एकदिवसीय सीरीज़
कुछ हफ़्तों में मेड इन इंडिया कोरोना वैक्सीन आने की उम्मीद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
कोरोना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह एक सर्वदलीय बैठक की. पीएम मोदी ने
महाराष्ट्र में बीजेपी को विधान परिषद चुनाव में लगा तगड़ा झटका, सिर्फ एक सीट पर मिल सकी जीत
महाराष्ट्र में बीजेपी को विधान परिषद चुनाव में तगड़ा झटका लगा है. विधान परिषद की
5वें दौर की बैठक: किसानों का दो टूक जवाब हम सरकार से चर्चा नहीं, बल्कि ठोस जवाब चाहते हैं वो भी लिखित में,
कृषि कानूनों को लेकर पिछले 9 दिनों से धरने पर बैठे किसानों के साथ केंद्र
रूस की नसीहत, वेस्ट बैंक में एकपक्षीय कार्रवाई से बचे इस्राईल
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने मेडिटरेनीयन डायलॉग्स बैठक को संबोधित करते हुए कहा