टूट गया अहंकार, झुक गए ट्रंप
जब ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद अली खामेनेई की शहादत के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अहंकार में डूबे हुए शब्दों में ट्वीट किया था कि खामेनेई खत्म हो गए, अब ईरान की सरकार अमेरिका से चलेगी, तब उन्हें अपने वहम-ओ-गुमान में भी यह अंदाज़ा नहीं था कि ईरान का पलटवार इतना घातक होगा कि उन्हें ईरान की शर्तें मानने पर मजबूर होना पड़ेगा।
आयतुल्लाह खामेनेई की शहादत के बाद ट्रंप को लगने लगा था कि वहाँ शासन परिवर्तन हो जाएगा और पाकिस्तान, बांग्लादेश, वेनेज़ुएला और सीरिया की तरह वहाँ भी उनकी मर्ज़ी के मुताबिक एक कठपुतली सरकार बन जाएगी, लेकिन सर्वोच्च नेता की शहादत के बाद जिस तरह ईरान ने इज़रायल पर और बहरीन, दुबई, क़तर और सऊदी अरब में अमेरिकी एयरबेस पर हमला किया, उससे पूरी दुनिया को अंदाज़ा हो गया था कि अमेरिका यह युद्ध हार जाएगा। लेकिन अहंकार में डूबे हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को अपनी हार स्वीकार करने में 40 दिन लग गए।
ट्रंप ने इस बात को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि ईरान को वेनेज़ुएला समझना उनकी ऐतिहासिक भूल थी। ट्रंप शायद इस बात को स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि हौसलों और जज़्बात से जीता जाता है। ईरान की सबसे बड़ी ताकत और मजबूती उसकी मिसाइल क्षमता नहीं, बल्कि उसकी जनता का अपार समर्थन था, जिसने भयानक बमबारी के बीच लगातार 40 दिन सड़क पर गुज़ार दिए। ईरानी जनता ने रमज़ान के पवित्र महीने में सड़कों पर ही इफ़्तार किया और सड़कों पर ही सहरी की। बारिश और बर्फबारी के बावजूद पूरे ईरान की जनता 40वें दिन तक सड़क पर ही डटी रही। उनका बस एक ही नारा रहा—“इंतक़ाम, इंतक़ाम, हमें सर्वोच्च नेता की शहादत का बदला चाहिए।” ईरान की सड़कें लगातार “मर्ग बर अमेरिका” और “मर्ग बर इज़रायल” के नारों से गूंजती रहीं।
अपने देश की जनता का यह उत्साह देखकर ईरानी सेना और अधिक आक्रामक हो गई। आईआरजीसी की जवाबी कार्रवाई ने ट्रंप और नेतन्याहू को एहसास करा दिया कि उन्होंने बहुत बड़ी भूल कर दी है और अब ईरान को युद्ध के मैदान में नहीं हराया जा सकता। इसके बाद उन्होंने धमकी देकर युद्धविराम कराने की कोशिश की, लेकिन ईरान ने उनकी धमकियों को अनदेखा करते हुए ज़बरदस्त प्रहार किया।
जो ट्रंप और नेतन्याहू ईरान में सत्ता परिवर्तन का सपना देख रहे थे, उन्हें अपनी ही सत्ता पलटती हुई दिखाई देने लगी। अमेरिका और इज़रायल में जिस तरह नेतन्याहू और ट्रंप के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे, उसे देखते हुए दोनों युद्ध से बाहर निकलने का बहाना तलाश करने लगे।
डोनाल्ड ट्रंप यह चाहते थे कि ईरान उनकी शर्तें मान ले, ताकि वे अकड़ के साथ युद्ध से बाहर निकल जाएँ और युद्ध समाप्त होने पर अपनी पुरानी आदत के अनुसार फिर से ट्वीट कर सकें कि—“ईरान ने हमारी शर्तें मान ली हैं, इसलिए यह युद्ध समाप्त!” लेकिन ईरान ने इस बार साफ संकेत दे दिया था कि हम लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं। अगर युद्धविराम होगा तो सिर्फ हमारी शर्तों पर होगा, वरना नहीं। आखिरकार 40वें दिन ट्रंप का अहंकार बिखर गया और वे ईरान की सभी शर्तों को स्वीकार करने पर मजबूर हो गए।
इस पूरी जंग का नतीजा क्या रहा??
अमेरिका_इज़राइल और ईरान के बीच जारी इस युद्ध के बीच सबके दिमाग ये दो सवाल ज़रूर घूम रहे होंगे
1– इस युद्ध में कौन जीता??
2– इस युद्ध का नतीजा क्या रहा??
इसका उत्तर है;
ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम बरकरार है
ईरान का यूरेनियम संवर्धन अब भी मौजूद है
ईरानी इस्लामी गणराज्य और मज़बूती के साथ मौजूद है
ख़ामनएई की जगह “ख़ामनएई 2.0” आ गया
ईरान ने अपना पावर दिखाते हुए जलडमरूमध्य-ए-हॉर्मुज़ पर अपना कंट्रोल साबित कर दिया
और दुनिया की सुपर पावर को जंगबंदी पर भी मजबूर कर दिया…
ये सब कमाल है ईरान की ऐतिहासिक प्रतिरोध का
अपने जियोग्राफिया, मिसाइल और ड्रोन टेक्नोलॉजी के ज़बरदस्त इस्तेमाल से ईरान ने बेकाबू हाथी को भी मजबूर कर दिया है।
अगले दो हफ्ते बहुत अहम हैं…ये वक़्त ही बताएगा।


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