ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों से अरब देशों का घिनौना चेहरा बेनक़ाब हो गया

ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों से अरब देशों  का घिनौना चेहरा बेनक़ाब हो गया

ओमान में अमेरिका और इज़रायल के बीच जब तीसरे दौर की वार्ता चल रही थी और दुनिया यह उम्मीद कर रही थी कि शायद तनाव कम होगा, उसी समय जो कुछ हुआ उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे काले चेहरों को बेनकाब कर दिया। वार्ता की आड़ में, भरोसे और कूटनीति की आड़ में, इज़रायल ने ईरान पर अचानक और कथित रूप से धोखे से हमला कर दिया। यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों, कूटनीतिक शिष्टाचार और इंसानी मूल्यों पर खुला प्रहार था।

इस हमले की भयावहता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें न केवल बड़े स्तर पर सैन्य नुकसान हुआ, बल्कि ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व को भी निशाना बनाया गया। सुप्रीम लीडर की हत्या—या उस तरह का कोई दावा—किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए सीधी-सीधी चुनौती होती है। यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अस्मिता, उसकी स्वतंत्रता और उसके अस्तित्व पर हमला माना जाता है।

इस जघन्य अपराध में अमेरिका भी खुल्लम-खुल्ला शामिल रहा। मीनाब में 170 मासूम छात्राओं की भी हत्या कर दी गई। इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अहंकारी अंदाज़ में लिखा कि “हमने खामेनेई को खत्म कर दिया, अब वहां रेजीम चेंज होगा।” लेकिन कुछ ही देर बाद जब ईरान की फौज ने दिलेराना अंदाज़ में जवाबी कार्रवाई की, तो डोनाल्ड ट्रंप अपना मानसिक संतुलन खो बैठे।

डोनाल्ड ट्रंप ने जब कथित रूप से बयान दिया और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी—कि “हमने खामेनेई को खत्म कर दिया” और “अब वहां रेजीम चेंज होगा”—उसने स्थिति को और अधिक भड़काऊ बना दिया। इस तरह की भाषा एक जिम्मेदार नेता की नहीं, बल्कि अहंकार और शक्ति के प्रदर्शन की प्रतीत होती है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसे बयान न केवल तनाव को बढ़ाते हैं, बल्कि युद्ध जैसी स्थितियों को और खतरनाक बना देते हैं।

जो नेतन्याहू हर थोड़ी देर में ट्वीट करते थे और लाइव आकर ईरान को खत्म करने की बात करते थे, उनके वजूद पर ही सवालिया निशान लग गया। अब तक लोग उनके ज़िंदा रहने पर ही संदेह कर रहे हैं।

दूसरी ओर, मीडिया और राजनीतिक विश्लेषण की दुनिया में भी एक अलग ही परिदृश्य देखने को मिला। कुछ विश्लेषकों और पत्रकारों पर आरोप लगे कि वे एकतरफा दृष्टिकोण अपना रहे हैं और इज़रायल का समर्थन कर रहे हैं, बिना पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा किए। कुछ डिबेट शो में यह सवाल उठाया गया कि अगर हमला अमेरिका और इज़रायल ने किया है, तो ईरान अरब देशों को क्यों निशाना बना रहा है??

लेकिन इस सवाल के साथ कई और सवाल भी खड़े होते हैं, जिन पर अक्सर चर्चा नहीं होती—

क्या किसी देश पर वार्ता के दौरान हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं है?

क्या किसी दूसरे देश के सर्वोच्च नेता को निशाना बनाना या उसकी धमकी देना आतंक फैलाने जैसा कृत्य नहीं है?

क्या किसी देश में शासन परिवर्तन (रेजीम चेंज) की खुली बात करना उसकी संप्रभुता में हस्तक्षेप नहीं है?

अब बात अरब देशों की भूमिका की भी होती है। यह सवाल उठता है कि अगर अमेरिका और इज़रायल ने इन देशों की ज़मीन या सैन्य ठिकानों का उपयोग करके ईरान पर हमला किया, तो क्या उन देशों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?

क्या उन्होंने इस पर आपत्ति जताई?

क्या उन्होंने अमेरिका से जवाब मांगा?

क्या उन्होंने अपने देश में मौजूद विदेशी सैन्य ताकतों के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाया?

अगर इन सवालों के जवाब ‘नहीं’ में हैं, तो यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है। इससे यह धारणा बनती है कि क्षेत्रीय राजनीति में कई देश खुलकर या परोक्ष रूप से एक ही रणनीति का हिस्सा बन गए हैं, भले ही उनके सार्वजनिक बयान कुछ भी हों।

ईरान की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि उसने केवल उन ठिकानों को निशाना बनाया जो उसके खिलाफ हमलों में इस्तेमाल किए जा रहे थे, न कि आम नागरिकों को। ईरान ने सिर्फ अमेरिकी ठिकानों (बेस) पर हमला किया है। कोई अरब शासकों से यह क्यों नहीं पूछता कि उन्होंने अमेरिका और इज़रायल को ईरान पर हमला करने के लिए अपनी ज़मीन इस्तेमाल करने की अनुमति क्यों दी?

हकीकत यह है कि, आयतुल्लाह ख़ामेनेई और मीनाब के स्कूल में 170 छात्राओं की हत्या में शामिल सभी अपराधी अपना चेहरा छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। काम सबका एक है, बस चेहरे बदले हुए हैं। लेकिन इज़रायल के इस नाजायज़ हमले की सज़ा सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं, पूरी दुनिया भुगत रही है। इज़रायल ने जो चिंगारी जलाई है, उसने एक भयानक आग का रूप ले लिया है, और उस आग की रोशनी में अरब देशों और उनके शासकों का घिनौना चेहरा सबके सामने आ गया है।

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