अली ख़ामेनेई की शहादत पर सिर्फ ईरान नहीं, हर इंसाफ़ पसंद सोगवार है

अली ख़ामेनेई की शहादत पर सिर्फ ईरान नहीं, हर इंसाफ़ पसंद सोगवार है

ईरान के सुप्रीम लीडर की शहादत के बाद पूरा ईरान सोगवार है। यह एक इंसान की मौत नहीं है, एक नज़रिए की मौत है। एक मज़बूत इरादे की मौत है। एक ऐसी ताक़त की मौत है, जिसने सारी दुनिया को दिखा दिया कि, ईमान की ताक़त क्या होती है। एक ऐसी शख्सियत की मौत है, जिसने दुनिया की अहंकारी और स्वार्थी ताकतों के सामने झुकने की जगह शहादत को गले लगाना पसंद किया।

सिर्फ़ ईरान ही नहीं, बल्कि हर इंसाफ़-पसंद और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने वाले इंसान के लिए यह एक गहरे ग़म का लम्हा है।

अली ख़ामेनेई की शहादत को अगर इस कल्पनात्मक नज़रिये से देखा जाए, तो यह किसी एक इंसान की मौत नहीं, बल्कि एक मज़बूत नज़रिये, एक अडिग इरादे और एक बेख़ौफ़ सोच की क़ुर्बानी है। वह सोच जो कहती थी कि ज़ुल्म के सामने झुकने से बेहतर है सर उठा कर मर जाना।

इस कल्पना में पूरा ईरान सोगवार है, क्योंकि उसने सिर्फ़ अपना रहनुमा नहीं खोया, बल्कि वह आवाज़ खो दी जिसने दुनिया की अहंकारी ताक़तों को आईना दिखाया। ख़ामेनेई को एक इंसान कहना नाइंसाफ़ी होगी—वह अपने आप में एक लश्कर थे। उनका यक़ीन था कि बिना शहादत के मौत बेमानी है, और यही यक़ीन उन्हें बाक़ी हुक्मरानों से अलग करता है।

कहते हैं कि दुश्मन उसी से डरता है जो बिकता नहीं। इस कल्पनात्मक शहादत के बाद अमेरिका और इज़रायल से ज़्यादा सुकून उन अरब हुक्मरानों को मिलेगा, जिनकी दोस्ती इंसाफ़ से नहीं बल्कि ताक़त, दौलत और बदकिरदार किरदारों से रही है। जिनके लिए फ़िलिस्तीन, यमन और इराक सिर्फ़ बयानात तक सीमित हैं, और जिनके ज़मीर विदेशी महफ़िलों में गिरवी रखे जा चुके हैं।

कहाँ हैं वो बिके हुए पत्रकार जो चीख़-चीख़ कर कहते थे कि ख़ामेनेई डर कर बंकरों में छुपे हैं या मुल्क छोड़ चुके हैं? इस कल्पना में जवाब साफ़ है—85 साल का बूढ़ा शेर अपने वतन की हिफ़ाज़त करते हुए, मुस्कुराते हुए, अपने घर और अपने लोगों के बीच इस दुनिया से रुख़्सत हुआ।

उनकी शहादत—इस कल्पनात्मक कहानी में—यह पैग़ाम छोड़ जाती है कि जिस क़ौम के पास शहादत का जज़्बा हो, उसे न बम डरा सकते हैं, न साज़िशें, और न ही बिके हुए ज़मीर।

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